मंत्रियों की नहीं सुन रहे IAS, अब हटाने की तैयारी:हेल्थ मिनिस्टर को लिखना पड़ा- आदेश की पालना हो, गहलोत की भी नहीं मानी बात

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मुख्य सचिव वी.श्रीनिवास के सेवा विस्तार बाद प्रदेश की टॉप ब्यूरोक्रेसी में बड़ा बदलाव हो सकता है। इनमें कलेक्टर से लेकर अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारी हटाए जा सकते हैं। इनमें वे अफसर भी हैं, जिनकी अपने विभाग के मंत्रियों नहीं पट रही है।

सूत्रों का कहना है कि मुख्य सचिव पंचायत चुनाव से पहले नई टीम को लेकर मैदान में उतरना चाह रहे हैं। फिलहाल प्रदेश में निकाय चुनावों को लेकर आचार संहिता लगी हुई है।

ऐसे में सरकार राज्य निर्वाचन आयोग की अनुमति से ट्रांसफर कर सकती है। किन विभागों के अफसर बदल जाएंगे? अफसरों और मंत्रियों में क्यों नहीं पट रही? पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

1. स्वास्थ्य मंत्री की प्रिंसिपल सेक्रेटरी को चिट्ठी- आदेश की पालना हो

हाल ही में तबादलों को लेकर भी मंत्री और अपने विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेटरी गायत्री राठौड़ के बीच विवाद सामने आया है। मंत्री गजेंद्र सिंह ने 5 और 8 अगस्त को मुकेश शर्मा, अधीक्षण अभियंता (एनएचएम) को तत्काल प्रभाव से अपने मूल विभाग जल संसाधन विभाग के लिए कार्यमुक्त करने और देवेंद्र कुमार मीना मुख्य अभियंता (स्वायत्त शासन विभाग) को हेल्थ डिपार्टमेंट में लगाए जाने को लेकर निर्देश दिए थे।

विवाद क्या? : 17 अगस्त तक प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने पालना रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्री को नहीं भेजी थी। इस पर मंत्री गजेंद्र सिंह ने नोटशीट पर टिप्पणी की- यह खेद का विषय है।

अत: आपको पुन निर्देशित किया जाता है कि आदेश की पालना तत्काल प्रभाव से करवाते हुए पालना रिपोर्ट कार्यालय को अविलंब भिजवाएं। हालांकि बाद में विवाद सुलझ गया। अगले ही दिन 18 अगस्त को मंत्री के आदेशों की पालना हो गई।

मंत्री की ओर से नोटशीट पर की गई टिप्पणी (लाल घेरे में)

मंत्री की ओर से नोटशीट पर की गई टिप्पणी (लाल घेरे में)

पहले भी लिख चुके हैं सीएम को चिट्ठी : स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह का अफसरों के साथ टकराव की खबरें आती रही हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने अपने विशिष्ट सहायक आरएएस अफसर बलवंत सिंह लिग्री को हटाने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी थी। बाद में लिग्री के स्थान पर सरकार ने आरएएस विभु कौशिक को लगा दिया।

2. मंत्री अविनाश गहलोत वर्सेज अपर्णा अरोड़ा एवं दिनेश कुमार

राज्य के सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग ने पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप में फर्जीवाड़ा करने वाली संस्थाओं के खिलाफ गड़बड़ियां पाई जाने पर पिछले साल 20 संस्थाओं पर बैन लगा दिया था।

आरोप है कि इन संस्थानों ने छात्रों के नाम पर फर्जी दस्तावेज भेजकर गलत तरीके से करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति राशि हड़पने ली। कॉलेजों और संस्थाओं ने फर्जीवाड़े में सहयोग किया।

विवाद क्या है? : सरकार की कार्रवाई के बाद अब ये संस्थान स्कॉलरशिप के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। इनके लॉग-इन आईडी बैन कर दिए हैं। ऐसे में इन संस्थानों में अध्ययनरत एससी-एसटी के स्टूडेंट्स स्कॉलरशिप से वंचित हो रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अविनाश गहलोत चाहते हैं कि एससी-एसटी के स्टूडेंट्स छात्रवृत्ति से वंचित न हो। ऐसे में रियायत दी जाए।

लेकिन विभाग की तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव अपर्णा अरोड़ा ने किसी भी तरह की रियायत देने से इनकार करते हुए बैन हटाने से साफ इंकार कर दिया था। बाद में अपर्णा अरोड़ा का तबादला हो गया। उनके स्थान पर आए दिनेश कुमार भी रियायत नहीं दे रहे हैं।

मंत्री क्या बोले?

3. मंत्री संजय शर्मा और विवाद

वन विभाग में जुलाई 2026 में आईएफएस (IFS) अधिकारियों के तबादले से पहले ही उन पदों पर आरएफएस (RFS) अधिकारियों को लगाने से विवाद उपजा था।

बाद में यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक पहुंचा था। हालांकि, बाद में अगस्त 2026 में आईएफएस ट्रांसफर लिस्ट जारी कर विवाद को सुलझा लिया गया था।

विवाद क्या? : दरअसल, वन विभाग में IFS के ट्रांसफर से पहले ही 4 RFS को पोस्टिंग दे दी गई थी। जयपुर उत्तर में IFS देवेंद्र सिंह की जगह RFS मनफूल बिश्नोई, अलवर में IFS राजेंद्र हुड्डा की जगह RFS ओमप्रकाश शर्मा, चित्तौड़गढ़ में IFS मृदुला सिंह की जगह RFS सुनील कुमार सिंह और उदयपुर उत्तर में IFS अजय चित्तौड़ा की जगह RFS देवेंद्र तिवारी को पोस्टिंग दे दी।

सूत्रों का कहना है कि ट्रांसफर लिस्ट को लेकर वनमंत्री संजय शर्मा और विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आनंद कुमार के बीच मतभेद रहे थे। इसलिए यह विवाद की स्थिति बनी।

क्यों होता है मंत्रियों और अफसरों में विवाद

वरिष्ठ पत्रकार महेश चंद्र शर्मा का कहना है- मंत्रियों का मानना है कि अधिकारी जनता से जुड़े जरूरी कामों और दिशा-निर्देशों को समय पर पूरा नहीं करते हैं। जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में मन मुताबिक काम या तबादले चाहते हैं। वहीं, अधिकारी नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए बात नहीं मानते हैं। यहीं से टकराव शुरू हो जाता है।

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