मरीज का इंटरव्यू कर डॉक्टर पता लगाएंगे बीमारी:इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी में तैयार ‘टूल’ करेंगे इस्तेमाल, 4 बड़े अस्पताल तलाशेंगे सुसाइड मामलों की असली वजह

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राजस्थान में बढ़ते सुसाइड मामले रोकने और मानसिक बीमारी की पहचान के लिए स्वास्थ्य विभाग दो बड़े प्रयोग करने जा रहा है।

पहला- डॉक्टर एक खास टूल के इस्तेमाल से मरीज का ‘इंटरव्यू’ कर उसकी मानसिक बीमारी का पता लगाएंगे। इंटरव्यू खत्म होते ही रिपोर्ट भी हाथों हाथ मिल जाएगी। इसके लिए इंग्लैंड की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर’ में तैयार ‘डिजिटल असेसमेंट टूल’ लागू किया जाएगा।

दूसरा- जयपुर और जोधपुर के चार बड़े अस्पतालों में ‘सेल्फ हार्म और सुसाइडल सर्विलांस सिस्टम’ शुरू होगा। इसके तहत सुसाइड में जान देने वाले लोगों की स्टडी कर असली कारणों की रिपोर्ट तैयार होगी। वहीं, सुसाइड में जिंदा बचे लोगों की काउंसलिंग कराई जाएगी, ताकि वो दोबारा ये स्टेप नहीं उठाएं।

मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए- आखिर कैसे एक टूल से बीमारी का पता चलेगा और कैसे रोके जाएंगे सुसाइड…

सबसे पहले समझते हैं क्या है- डिजिटल असेसमेंट टूल?

अगर कोई मरीज तनाव, डिप्रेशन, नींद, भूख, ध्यान लगाने में परेशानी या दूसरी मानसिक स्वास्थ्य समस्या लेकर अस्पताल पहुंचता है तो डॉक्टर उसका ‘डिजिटल इंटरव्यू’ करेंगे।

इसके लिए डॉक्टर मोबाइल या कंप्यूटर पर ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर’ का तैयार किया ‘ग्लोबल मेंटल हेल्थ असेसमेंट टूल’ खोलेंगे। इस टूल में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं की पहचान के लिए सवाल पहले से तैयार होंगे।

सवालों के जवाब से ही तय होगा कौनसी बीमारी के हैं लक्षण

इन सवालों को अलग-अलग बीमारी की पहचान के लिए डिजाइन किया गया है। डॉक्टर मरीज के जवाब ऑनलाइन टूल में दर्ज करेंगे। उसी समय एक प्रोविजनल असेसमेंट रिपोर्ट तैयार हो जाएगी।

इस रिपोर्ट से पता चल जाएगा कि मरीज कौनसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। जैसे- चिंता और एंग्जाइटी, उदासी और डिप्रेशन से जुड़े लक्षण, नींद और भूख में बदलाव, हेल्थ एंग्जाइटी, फोबिया, मेनिया, थॉट डिसऑर्डर, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर, अटेंशन डेफिसिट/हाइपर एक्टिविटी, ऑटिस्टिक बिहेवियर आदि।

इसके बाद डॉक्टर जरूरत के मुताबिक अतिरिक्त सवाल पूछकर तय करेंगे कि मरीज को इलाज चाहिए, काउंसलिंग चाहिए या विशेषज्ञ के पास रेफर करना है।

ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को भी मिलेगा इस टूल का फायदा

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस डिजिटल टूल का एक फायदा ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को भी मिलेगा। डिस्पेंसरी, पीएचसी, सीएचसी में तैनात मेडिकल ऑफिसर बिना विशेषज्ञ के इस टूल के इस्तेमाल से मानसिक रोगियों की बीमारी पहचान पाएंगे।

अगर किसी मरीज को तत्काल विशेषज्ञ की सलाह की जरूरत है तो उसे टेलीमेडिसिन के जरिए विशेषज्ञ से कंसल्टेशन कराया जा सकेगा।

यानी मरीज को हर बार मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाने की जरूरत नहीं होगी। स्थानीय स्तर पर शुरुआती असेसमेंट के बाद जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की राय ली जा सकेगी।

यह टूल लागू कैसे होगा?

  • साधारण भाषा में समझें तो यह टूल एक तरह से मोबाइल एप की तरह है। इसे राजस्थान के हेल्थ डिपार्टमेंट के सर्वर पर लिया जाएगा। इसके बाद इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
  • इस टूल की ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है। पहले जिला स्तर के मनोरोग विशेषज्ञों को ट्रेनिंग दी गई है। अगले चरण में 7 हजार कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर को इस टूल की ट्रेनिंग दिलाई जाएगी। ये सभी CHO आयुष्मान आरोग्य मंदिर में तैनात हैं।
  • टूल मोबाइल और कंप्यूटर दोनों पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। मरीज की गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाएगा।
  • इससे सरकार के पास मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का डेटा भी तैयार होगा। यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदेश के किस इलाके में किस तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्या ज्यादा हैं और उसके हिसाब से स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाई जा सके।

सेल्फ हार्म एंड सुसाइडल सर्विलांस प्रोग्राम : 4 अस्पतालों के डॉक्टर करेंगे सुसाइड मामलों की मॉनिटरिंग

राजस्थान में औसतन डेली एक लाख लोगों पर 6.4 लोग सुसाइड करते हैं। इसके लिए चार अस्पतालों- जयपुर के SMS और RUHS, जोधपुर मेडिकल कॉलेज और जोधपुर एम्स में ‘सेल्फ हार्म एंड सुसाइडल सर्विलांस प्रोग्राम’ शुरू किया जा रहा है। इन अस्पतालों में आत्महत्या और आत्महत्या के प्रयास के मामलों की जानकारी जुटाई जाएगी। उनकी केस स्टडी की जाएगी।

सिर्फ आंकड़े नहीं जुटेंगे, वजह भी खोजी जाएगी

इस सर्विलांस सिस्टम का मकसद केवल यह पता लगाना नहीं है कि कितने लोगों ने आत्महत्या की या कितने लोगों ने प्रयास किया। एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम ऐसे मामलों का सोशल ऑडिट करेगी।

ऑडिट में यह जानने की कोशिश होगी कि सुसाइड या सुसाइड के प्रयास के पीछे क्या कारण थे। कारणों की पहचान के बाद भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एक्शन प्लान तैयार किया जा सकेगा।

सुसाइड में बचे लोगों की होगी काउंसलिंग

जिन लोगों ने आत्महत्या का प्रयास किया, लेकिन वे बच गए, ऐसे लोगों की काउंसलिंग कराई जाएगी। ताकि दोबारा ऐसी स्थिति पैदा होने का खतरा कम किया जा सके।

यानी सिस्टम का फोकस घटना होने के बाद केवल इलाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समझने की कोशिश भी होगी कि व्यक्ति ऐसी स्थिति तक क्यों पहुंचा और आगे इसे कैसे रोका जाए।

स्वास्थ्य विभाग के नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के नोडल ऑफिसर डॉ. सांवरमल स्वामी ने बताया- ‘सेल्फ हार्म एंड सुसाइडल सर्विलांस सिस्टम’ देश में पहली बार बेंगलुरु (कर्नाटक) में शुरू हुआ था। राजस्थान इसे लागू करने वाला देश में दूसरा राज्य बनेगा।

राजस्थान में पहले से चल रहा गेटकीपर कार्यक्रम

आत्महत्या की रोकथाम के लिए राजस्थान में ‘गेटकीपर कार्यक्रम’ पहले से चल रहा है। इसे पिछले साल शुरू किया गया था और शुरुआती तौर पर जयपुर, कोटा और सीकर में लागू किया गया है।

इसके तहत यूनिवर्सिटी-कोचिंग एकेडमी में ऐसे लोगों को तैयार किया जा रहा है जो किसी व्यक्ति में आत्महत्या से जुड़े ‘रेड फ्लैग साइन’ पहचान सकें और जरूरत पड़ने पर उसे एक्सपर्ट तक पहुंचा सकें।

NIMHANS बेंगलुरु के विशेषज्ञों ने इसके लिए 99 मास्टर ट्रेनर्स तैयार किए हैं। आगे ANM, डॉक्टर, आशा सुपरवाइजर और शिक्षकों को भी ट्रेनिंग दी जानी है।

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