
2026 के केमिस्ट्री नोबेल का ऐलान आज होगा। इस बार पुरुस्कार के लिए भारतीय मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम भी चर्चा में है।

उन्हें इसी साल डेविड क्लेनरमैन और पास्कल मेयर के साथ वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार मिला है। तीनों को अगली पीढ़ी की DNA सीक्वेंसिंग को विकसित करने में अहम योगदान के लिए सम्मानित किया गया था।
इसके अलावा प्रोटीन में इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर, खुद बनने वाली आणविक परत, पेरोव्स्काइट सोलर सेल और ग्लाइकोप्रोटीन बनाने जैसी खोजों के वैज्ञानिकों के नाम भी चर्चा में हैं।
नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।

शंकर बालासुब्रमण्यम ने DNA पढ़ने की रफ्तार
शंकर बालासुब्रमण्यम और डेविड क्लेनरमैन ने ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें एक साथ बड़ी संख्या में DNA की कॉपी को पढ़ा जा सकता है। इससे DNA सीक्वेंसिंग की रफ्तार करीब 10 लाख गुना बढ़ी और इसकी लागत भी काफी कम हुई।
उनके काम से बनी सीक्वेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल अब दुनिया में होने वाली 90% से ज्यादा सीक्वेंसिंग में होता है। इससे जीन से जुड़ी बीमारियों को समझने, इलाज की योजना बनाने और प्रिसीजन मेडिसिन यानी मरीज के हिसाब से इलाज तय करने में मदद मिली है।
पास्कल मेयर ने इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लायक बनाने में योगदान दिया। उन्होंने केमिस्ट्री, माइक्रोफ्लूडिक्स, ऑप्टिक्स और कंप्यूटर तकनीक को एक साथ जोड़कर हाई-थ्रूपुट सीक्वेंसिंग सिस्टम तैयार करने में मदद की। इससे इंसानी जीनोम की सीक्वेंसिंग की लागत 200 डॉलर से कम तक पहुंचने में मदद मिली।

चेन्नई में जन्मे, एक साल की उम्र में ब्रिटेन चले गए
शंकर बालासुब्रमण्यम का जन्म 1966 में मद्रास यानी आज के चेन्नई में हुआ था। अगले ही साल वे अपने माता-पिता के साथ ब्रिटेन चले गए।
वे फिलहाल यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में हर्शेल स्मिथ प्रोफेसर ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री हैं। वे कैंसर रिसर्च यूके के कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट में सीनियर ग्रुप लीडर भी हैं।
उन्होंने 1988 में कैम्ब्रिज से नेचुरल साइंसेज में BA और 1991 में एंजाइम केमिस्ट्री में PhD की। 1994 में वे कैम्ब्रिज की फैकल्टी से जुड़े। उन्हें 2017 में नाइटहुड से सम्मानित किया गया। उन्हें रॉयल मेडल, मिलेनियम टेक्नोलॉजी प्राइज और ब्रेकथ्रू प्राइज फॉर लाइफ साइंसेज भी मिल चुके हैं।
प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन कैसे जाते हैं, यह समझाने वाले वैज्ञानिक भी दावेदार
केमिस्ट्री नोबेल के लिए हैरी बी. ग्रे और जे विंकलर के नाम भी चर्चा में हैं। दोनों ने यह समझाने में अहम काम किया कि प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाते हैं।
हमारे शरीर में ऊर्जा बनाने वाली कई प्रक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन का एक जगह से दूसरी जगह जाना जरूरी होता है।
दोनों वैज्ञानिकों के काम से यह समझने में मदद मिली कि इलेक्ट्रॉन प्रोटीन के अंदर लंबी दूरी कैसे तय करते हैं और इसमें प्रोटीन की बनावट की क्या भूमिका होती है।





