सिलिकॉन वैली का नया जुनून: भ्रूण स्क्रीनिंग से ‘स्मार्ट’ बच्चे:अमेरिकी स्टार्टअप्स के मुताबिक जन्म से पहले पता चलेगी बच्चे की आईक्यू और लंबाई

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न्यूयॉर्क की सबवे (मेट्रो) ट्रेनों में हाल ही में लगे कुछ विज्ञापनों ने यात्रियों को चौंका दिया। एक पोस्टर पर लिखा था… ‘अपना सबसे बेहतरीन बेबी हासिल करें’ तो दूसरे पर कुछ इस तरह की लाइनें दिखीं-‘आईक्यू (बुद्धिमत्ता का पैमाना) 50% आनुवंशिक होता है।’

ये विवादित विज्ञापन किसी साइंस-फिक्शन फिल्म के नहीं, बल्कि सिलिकॉन वैली के एक नए और उभरते स्टार्टअप ‘न्यूक्लियस’ के हैं। ‘ऑर्किड’ व ‘हेरासाइट’ जैसी कई कंपनियां इस होड़ में शामिल हैं। सभी का उद्देश्य एक ही है- एंब्रियो स्क्रीनिंग टेक्नोलॉजी के जरिए इंसानों को पैदा करने का तरीका हमेशा के लिए बदल देना। अब तक आईवीएफ में भ्रूण की जांच पीजीटी-ए और पीजीटी-एम तकनीकों के जरिए मुख्य रूप से गंभीर आनुवंशिक बीमारियों और क्रोमोसोम संबंधी गड़बड़ियों का पता लगाने के लिए की जाती थी।

अब कंपनियां नई तकनीक पीजीटी-पी (पॉलीजेनिक स्क्रीनिंग) पेश कर रही हैं। इसके जरिए भ्रूण के डीएनए का विश्लेषण कर कैंसर, डायबिटीज और दिल से जुड़ी बीमारियों के संभावित जोखिम का अनुमान लगाया जाता है। इतना ही नहीं, करीब 40 लाख रुपए खर्च कर बच्चे की संभावित लंबाई, आईक्यू, उम्र तथा आंखों और बालों के रंग संबंधी अनुमानित स्कोर भी हासिल कर सकते हैं। ब्रिटेन समेत कई देशों में भ्रूण का लिंग चयन या रंग-रूप तथा बुद्धिमत्ता के आधार पर स्क्रीनिंग गैरकानूनी है। अमेरिका में सख्ती नहीं है, फिर भी इस तकनीक को लेकर बहस छिड़ गई है। आलोचकों का तर्क है कि यह मनचाहे गुणों वाले इंसान बनाने की दिशा में कदम है, जिससे अमीर-गरीब परिवारों के बच्चों के बीच जेनेटिक असमानता बढ़ सकती है।

इसके अलावा जो बच्चा लाखों रुपए खर्च करके ‘ऊंचे आईक्यू’ व ‘खास गुणों’ के साथ पैदा होगा, उस पर पैरेंट्स और समाज का भारी दबाव होगा। यदि वह पढ़ाई में सामान्य निकला, तो उसका मानसिक तनाव भयानक हो सकता है। विवादों के बावजूद पीटर थील और इलॉन मस्क जैसे निवेशकों ने फर्टिलिटी स्टार्टअप्स में करोड़ों डॉलर लगाए हैं। फिलहाल यह बाजार 3 लाख करोड़ रुपए का है। एक्सपर्ट मानते हैं अगर ऑटोमेशन बढ़ता है, तो एक दशक में यह 41 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।

अनजाने में गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है: एक्सपर्ट

ट्रिनिटी कॉलेज के जेनेटिसिस्ट केविन मिशेल और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट का मानना है कि जटिल गुणों (जैसे आईक्यू या लंबाई) का सटीक अनुमान एकल भ्रूण के लिए लगाना मुश्किल है। पर्यावरण, खान-पान व पालन-पोषण का भी बच्चे पर बड़ा असर पड़ता है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के डॉ. ग्राहम कूपर कहते हैं,‘हजारों जीन के जटिल ताने-बाने को देखकर किसी एक बच्चे के भविष्य का सटीक अनुमान लगाना मौसम की भविष्यवाणी जैसा है। जेनेटिक्स एक्सपर्ट मैरी वार्ड ने आगाह किया है कि सुंदरता या बुद्धिमत्ता के लिए जीन्स के चुनाव की उलझन में माता-पिता अनजाने में बच्चे में किसी अन्य गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं।

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