
राघव चंद्रा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के पूर्व चेयरमैन
ये सच है कि देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। लेकिन परियोजनाओं के पूरा होने के चंद दिनों में ही उनमें लगातार सामने आ रही खामियां चिंता का विषय हैं। भारी-भरकम बजट से तैयार और हाल ही में शुरू हुए लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे और गंगा एक्सप्रेस-वे में सर्फेस स्लिपेज, दरारें पड़ने, जमीन धंसने और गड्ढे होने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

इससे पहले दिल्ली-देहरादून और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे में भी ऐसा ही हुआ था। इन घटनाओं में हुआ आर्थिक नुकसान करोड़ों में है, लेकिन इससे जनता और सरकार के बीच आई भरोसे की कमी कहीं ज्यादा बड़ी क्षति है।
3 मई 2026 की रात भागलपुर के पास विक्रमशिला सेतु का 33 मीटर लंबा स्लैब टूटकर गिर गया। 4.7 किलोमीटर लंबे पुल के दो हिस्सों में बंटने से दक्षिण और उत्तर बिहार का सड़क-लिंक टूट गया। जब तक सेना और बीआरओ ने मिलकर बैली ब्रिज नहीं बनाया, यात्रियों को 161 किलोमीटर लंबे वैकल्पिक मार्ग से जाना पड़ा और फिर नावों का सहारा लेना पड़ा।
2022 से 2024 के बीच अगुवानी से सुल्तानगंज के बीच बन रहा पुल भी तीन बार ढहा। मई 2025 में केरल में एनएच-66 के रामानाट्टुकरा-वलंचेरी स्ट्रेच पर प्रोजेक्ट पूरा होने वाला ही था कि एक रीइन्फोर्स्ड अर्थ वॉल ढह गई।
अगस्त 2025 में हिमाचल प्रदेश और पंजाब के बीच चक्की ब्रिज कॉरिडोर पर कुछ महीने पहले ही बनी 100 मीटर लंबी प्रोटेक्शन वॉल टूट गई। हाल ही में मध्य रेलवे (सीआर) के भोरघाट सेक्शन में ठाकुरवाड़ी और मंकी हिल के बीच हुए भूस्खलन ने भारी क्षति पहुंचाई। 50-60 मीटर रेलवे लाइन बह गई। 30 ट्रेनें रद्द हुईं।
ये अलग-अलग जगहों पर दुर्भाग्यवश हुए मामले नहीं हैं। भू-तकनीकी जांच की कमी, ग्राउंड-इम्प्रूवमेंट उपायों की अनदेखी, ड्रेनेज के पर्याप्त इंतजाम नहीं करना, ऐसे इलाकों में रीइन्फोर्स्ड-सॉइल वॉल तकनीक का इस्तेमाल, जहां वह उपयुक्त ही नहीं थी- ये ऐसी खामियां हैं, जिन्हें इन घटनाओं का कारण माना जा सकता है।
एक अन्य बड़ा कारण डिजाइनरों, कंपनियों, स्वतंत्र इंजीनियरों और एनएचएआई के फील्ड कर्मचारियों के बीच सुपरवाइजरी ढांचे का इतना बिखरा हुआ होना है कि कुछ गलत होता है तो किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
जिस दीवार, सड़क या पुल के हिस्से को ढहना ही नहीं चाहिए था, उसे दोबारा बनाने में खर्च हुआ हर रुपया वो है, जो नया इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने या मौजूदा ढांचों की मरम्मत में काम आ सकता था। इसमें बहुत-सी अप्रत्यक्ष लागत भी जुड़ जाती है। मसलन, डायवर्जन के फेर में माल ढुलाई में देरी होती है, घंटों के अतिरिक्त चक्कर में उत्पादकता घटती है और जिन कामों के लिए पुल बने थे, वे अब फिशिंग बोट से करने पड़ते हैं।
चूंकि सरकारी टेंडर सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार को दिए जाते हैं, इसलिए गुणवत्ता प्रभावित होती है। जो ठेकेदार बहुत कम बोली लगाकर प्रोजेक्ट हासिल करते हैं, उनके पास मुनाफा निकालने का एक ही रास्ता बचता है- मटैरियल, जमीन की जांच और निर्माण कार्य में कटौती।
डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट और ग्राउंड असेसमेंट हर प्रोजेक्ट की रीढ़ होते हैं। लेकिन अकसर इन्हें पिछली परियोजनाओं की रिपोर्ट से ही बना लिया जाता है। बस नई जगह की भौगोलिक स्थिति, वाटर टेबल या बाढ़ की हिस्ट्री के हिसाब से छोटे-मोटे बदलाव किए जाते हैं।
स्वतंत्र इंजीनियरों का काम कंक्रीट डालने से पहले इन कमियों को पकड़ने का होता है। लेकिन अकसर उनके पास ऐसे अनुभव या अधिकार का अभाव होता है, जिसमें वे परियोजना को रोक सकें। रीइन्फोर्स्ड वॉल और पुलों की डिजाइन की जांच होनी चाहिए। यह महज सामान्य डीपीआर के अनुमानों पर नहीं, बल्कि पुष्ट मृदा परीक्षण और कम से कम एक दशक के मानसून और बाढ़ के आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए।
अन्य तकनीकी सुधारों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमें इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की गति पर गर्व करना और उसका महिमामंडन बंद करना चाहिए। हमें क्वांटिटी से अधिक क्वालिटी, दिखावे से अधिक टिकाऊपन और जल्दबाजी से अधिक प्रभावशीलता को महत्व देना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)






