
बच्चा जब इस दुनिया में आता है, तो उसकी मुट्ठियां बंद होती हैं, पर कान खुले होते हैं। सच तो यह है कि उसके कान गर्भावस्था में भी आवाज़ों की टोह ले रहे होते हैं। गुज़रते दिनों के साथ मां की लोरी, पिता की आवाज़, दादी की कहानी, आंगन की बतकही और गली-मोहल्ले की पुकार—यही सब धीरे-धीरे उसके भीतर एक अदृश्य संसार को आकार देते हैं। शब्दों का यह संसार इतना गहरा होता है कि जब बच्चा पहली बार बोलता है, तब वह केवल भाषा नहीं बोल रहा होता, बल्कि अपने पूरे परिवेश का परिचय दे रहा होता है। इसीलिए किसी छोटे बच्चे के मुंह से कोई अपशब्द सुनकर पहले लोग चौंक उठते थे। उन्हें उस एक शब्द से उतना दुख नहीं होता था, जितना इस बात से कि यह शब्द आख़िर उसके कानों तक पहुंचा कहां से! बच्चे शब्द गढ़ते नहीं, उन्हें विरासत में पाते हैं। सबसे बड़ी पैतृक सम्पत्ति कई बार मकान नहीं, भाषा होती है।
यह हमारे घर की भाषा नहीं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं कि सुनते ही मन में फूल खिल उठते हैं और कुछ ऐसे कि जैसे किसी ने तीर चलाकर कलेजा चीर दिया हो। भाषा केवल यह नहीं बताती कि हम क्या बोलते हैं, वह यह भी बता देती है कि हम कौन हैं। जब किसी के बारे में लोग कहते हैं—‘आदमी बड़ा मीठा बोलता है’—तो इस एक वाक्य में उसके पूरे व्यक्तित्व, शिक्षा, परिवार और मन का परिचय समा जाता था।
बात केवल हमारे रोज़मर्रा के अनुभवों की नहीं है। बीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध भाषाविद् एडवर्ड सपिर और बेंजामिन ली व्हॉर्फ ने विचार रखा कि भाषा केवल विचारों को व्यक्त नहीं करती, बल्कि मनुष्य के सोचने के ढंग को भी प्रभावित करती है। भाषा केवल मन की अभिव्यक्ति नहीं, मन की निर्माता भी है। इसीलिए हमारे यहां भाषा को केवल व्याकरण का विषय नहीं माना गया, वह व्यवहार और संस्कार का विषय थी। ‘बड़ों से ऐसे बात नहीं करते’, ‘पहले प्रणाम करो’—जैसी बातें किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थीं, फिर भी हर घर की शिक्षा का अनिवार्य अंग थीं। यदि किसी बच्चे के मुंह से अपशब्द निकल जाए तो बुज़ुर्ग कहते थे, ‘बेटा, यह हमारे घर की भाषा नहीं है।’
शब्द सबकुछ बता देते हैं
भारतीय लोकजीवन की ओर देखिए तो लोकभाषा का संस्कार अद्भुत रूप में दिखाई देता है। अपरिचित आदमी भी ‘भैया’ था, खेत का किसान ‘काका’, गली की वृद्धा ‘माई’ और राह चलती स्त्री ‘बहिन’ या ‘दीदी’ थी। गांव में आधे लोग रक्त संबंधी नहीं होते थे, पर भाषा ने सबको रिश्तों की डोर में बांध रखा था। ‘राम-राम’, ‘प्रणाम’ ‘राधे-राधे’ या ‘नमस्ते’—इन सबमें सामने वाले के मंगल की भावना छिपी रहती थी। भाषा पहले सम्मान देती थी, परिचय बाद में पूछती थी।
भाषा केवल भाषा नहीं होती, वह सभ्यता-संस्कृति की वाहक होती है, हमारे स्वयं के साथ-साथ हमारे परिवार, समाज और देश तक के व्यवहार-संस्कार का पता देती है। दिलचस्प है कि संस्कृत में ‘गाली’ का संसार आज जैसा नहीं मिलता। वहां कटु वचन हैं, दुर्वचन हैं, अपशब्द हैं, पर पारिवारिक रिश्तों को लक्ष्य बनाकर अश्लील गालियों की परंपरा अनुपस्थित है। मूर्ख, दुष्ट, खल, पाखंडी, पापात्मा, अधम—यही उस समय की कठोरतम गालियां थीं। यह अंतर बताता है कि किसी समाज की गालियां भी उसकी संस्कृति का इतिहास लिखती हैं।
पीढ़ी बदली तो भाषा क्यों पलटी?
यहीं आकर आज का समय हमें बेचैन करता है। बीते दिनों हुए छात्र आंदोलन में जैसी भाषा नई पीढ़ी की ज़बान से निकली, उसके चलते यह सवाल हवा में तैरने लगा है कि क्या प्रतिरोध की नई भाषा यही है? जेन ज़ी के नाम पर प्रचारित यह भाषा ही क्या आज के समाज की सहज भाषा है? यदि ऐसा है तो यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, समाज की संवेदना के बदलने का संकेत है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि हिंसा से पहले भाषा हिंसक होती है। शब्दों में करुणा घटती है, कटुता बढ़ती है; फिर वही कटुता व्यवहार में उतरने लगती है। अपशब्दों की भाषा में अक्सर भीतर बैठा अहंकार प्रकट होता है।
हमारे यहां पुरानी उक्ति है कि वाणी मन का दर्पण है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा ने अपने ‘सामाजिक अधिगम सिद्धांत’ में बताया कि मनुष्य का व्यवहार अनुकरण से बनता है। बच्चे बोलना अपने आसपास के लोगों से सीखते हैं। जिस घर में सम्मान की भाषा होगी, वहां बच्चे सम्मान सीखेंगे। जिस घर में अपमान सामान्य होगा, वहां वही भाषा अगली पीढ़ी की ज़बान पर चढ़ेगी। आज इस सीखने की प्रक्रिया में एक नया शिक्षक जुड़ गया है : मोबाइल स्क्रीन। पहले बच्चा दिनभर में दस-पंद्रह लोगों की भाषा सुनता था, अब सैकड़ों लोगों की सुनता है। समस्या तब शुरू होती है, जब लोकप्रियता का पैमाना शालीनता नहीं, सनसनी बन जाती है। डिजिटल मनोरंजन, वेब-सीरीज़ और सोशल मीडिया ने इस धारणा को मज़बूत किया कि जितनी बेधड़क भाषा, उतनी वास्तविक अभिव्यक्ति। परिणाम यह हुआ कि जो शब्द कभी बंद कमरों तक सीमित थे, वे सार्वजनिक मंचों पर भी बिना संकोच सुनाई देने लगे।
संबोधन से बंधे रहते हैं संबंध
अपशब्दों की भाषा का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह मनुष्य के भीतर सम्मान की जगह धीरे-धीरे कम करती जाती है। जब संबोधन बदलते हैं, तो संबंध भी बदलते हैं। कई बार व्यक्ति विचार से नहीं, सीधे व्यक्ति पर आक्रमण करने लगता है। मतभेद धीरे-धीरे मनभेद में बदल जाता है। पहले, दो स्त्रियां झगड़ भी लें, तो थोड़ी देर बाद कोई तीसरा कह देता, ‘अरे भौजी, अब छोड़ो भी।’ बस, एक संबोधन तनाव को हल्का कर देता था। लोकभाषाओं की शक्ति यही थी कि उन्होंने संबंधों को बचाए रखा।
इसलिए यह बड़ा प्रश्न है कि आज हम कैसी भाषा बोल रहे हैं। केवल ज़माने या किसी पीढ़ी को कोस लेने से यह सवाल हल नहीं होगा। सोचिएगा ज़रूर…






