
तारीख थी 9 मई और 1988 का साल। गर्मी में अमृतसर तप रहा था, लेकिन स्वर्ण मंदिर के भीतर का तापमान उससे भी ज्यादा था।
वजह थी- सैकड़ों चरमपंथियों ने सिखों के सबसे पवित्र गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर रखा था। उनके पास एके-47, हैवी मशीनगन, रॉकेट लॉन्चर और हैंड ग्रेनेड का जखीरा था। निशाने पर थी- पंजाब और दिल्ली की केंद्र सरकार।
चार साल पुरानी यानी 1984 की डरावनी तस्वीरें सबकी आंखों में तैर रही थीं। तब जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके साथियों को स्वर्ण मंदिर से निकालने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया था। भारतीय सेना गुरुद्वारे में घुस गई थी, टैंकों से गोले दागे गए।

सिखों की धार्मिक सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुंचा। पंजाब में चरमपंथ और भड़क गया। उसी साल 31 अक्टूबर को इंदिरा की हत्या उन्हीं के सिख बॉडीगार्डों ने कर दी।
इस बार देश की कमान राजीव गांधी के हाथों में थी। उन्होंने अफसरों को साफ आदेश दे रखा था- ‘सेना मंदिर के भीतर कदम नहीं रखेगी।’
अफसरों के हाथ-पांव फूल गए। बिना फौज भेजे स्वर्ण मंदिर को खाली कैसे कराया जाए…?

9 मई की सुबह। पंजाब पुलिस के DIG एसएस विर्क स्वर्ण मंदिर के बाहर गश्त लगा रहे थे। तभी अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी। एक गोली DIG विर्क को जा लगी। वे वहीं गिर पड़े। उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया।
सरकार हिल गई। उसी दोपहर, पंजाब के DGP केपीएस गिल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफसरों की मीटिंग हुई। नक्शे बिछाए गए, रणनीति बनी और एक सीक्रेट ऑपरेशन लॉन्च किया गया- ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’।
शाम ढलते-ढलते पंजाब पुलिस और CRPF के जवानों ने स्वर्ण मंदिर को घेर लिया।
अगले दिन… नीली पग बांधे एक रिक्शावाला मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगा। चरमपंथियों को शक हुआ कि यह पुलिस का मुखबिर है। उन लोगों ने उसकी रैकी शुरू कर दी।
रिक्शेवाला कब आता है, किस गली से गुजरता है, कहां रुकता है, किससे बात करता है… उसकी एक-एक हरकत नोट की जाने लगी।
एक दिन, रिक्शावाला सीधे मंदिर के भीतर चला आया। उग्रवादियों ने उसे देखते ही घेर लिया। राइफलें तन गईं।
रिक्शेवाले ने हाथ ऊपर उठाते हुए कहा- ‘मुझे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने भेजा है। मैं आप लोगों की मदद करने आया हूं।’
एक चरमपंथी चिल्लाया- ‘हम कैसे मान लें कि तू उस पार से आया है?’
रिक्शेवाले ने कहा- ‘मेरी बोली और लहजा काफी नहीं है क्या? सबूत देखना है, तो देखो।’
उसने जेब से कुछ तस्वीरें निकालकर आगे बढ़ा दीं। तस्वीरों में वह पाकिस्तान की अलग-अलग जगहों पर, वहां के लोगों और सरकारी हुक्मरानों के साथ था।
चरमपंथियों को यकीन हो गया कि यह ISI का बंदा है।
रिक्शेवाले ने कहा- ‘बाहर भले ही हिंदुस्तानी फौज घेरा डाले बैठी है, लेकिन राजीव गांधी की हिम्मत नहीं है मंदिर के भीतर एक भी गोली चलाने की।’
‘तुझे इतना यकीन कैसे है?’ चरमपंथियों ने पूछा।
रिक्शेवाले ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘आजमाकर देख लो।’
इसके बाद रिक्शेवाले का मंदिर में बेरोक-टोक आना-जाना शुरू हो गया। जल्द ही उसके दिमाग में स्वर्ण मंदिर का पूरा खाका छप गया- ‘कितने चरमपंथी हैं, उनके पास कौन-कौन से हथियार हैं, उनका मुख्य कमांडर कहां बैठता है…’
एक शाम, वही रिक्शावाला एक बंद कमरे में पंजाब के DGP केपीएस गिल के सामने खड़ा था। उसने कहा- ‘फौरन NSG के ब्लैक कैट कमांडोज को बुला लीजिए।’
उसी रात, भारतीय वायुसेना के विशेष विमान IL-76 से NSG के कमांडो नीचे उतरे। उन्हें पंजाब पुलिस और CRPF की वर्दियां पहनाई गईं और रात के अंधेरे में ही मंदिर के चारों तरफ तैनात कर दिया गया।
कमांडोज को टारगेट था- ‘जैसे ही कोई चरमपंथी बाहर दिखे, उसे ढेर कर दो।’
दिन बीतने लगे, लेकिन अंदर से कोई बाहर निकला ही नहीं। फौज परेशान थी कि आगे क्या किया जाए?
रिक्शावाला फिर से DGP गिल के पास पहुंचा। उसने कहा- ‘मंदिर परिसर की बिजली कटवा दीजिए। बाहर से खाना और पानी अंदर मत जाने दीजिए।’
हुक्म मिलते ही मंदिर परिसर की बिजली काट दी गई। बाहर से रसद और पानी का जाना पूरी तरह बंद कर दिया गया।
अब तक 15 मई आ चुकी थी। गर्मी और प्यास से तड़पते हुए चरमपंथियों का एक मुख्य कमांडर जागीर सिंह सब्र खो बैठा। वह पानी पीने के लिए स्वर्ण मंदिर के सरोवर की ओर बढ़ा।
तभी NSG के एक स्नाइपर की उंगली ट्रिगर पर दबी और गोली जागीर सिंह के सीने को चीरती हुई निकल गई। वह वहीं ढेर हो गया।
कमांडर की मौत, भूख-प्यास और NSG के अचूक निशाने…जल्द ही अंदर बैठे चरमपंथियों की हिम्मत टूटने लगी। 41 चरमपंथी मारे जा चुके थे।
रिक्शेवाला ने चरमपंथियों कहा- ‘जिंदा रहने का एक ही रास्ता है- सरेंडर। आज जिंदा बचोगे, तभी तो कल फिर से हमला कर पाओगे।’
आखिरकार, 18 मई 1988 को करीब 200 चरमपंथियों ने सरेंडर कर दिया।
ये रिक्शेवाला था- अजीत डोभाल, यानी भारत के मौजूदा सुरक्षा सलाहकार। आज स्पाई फाइल्स में इन्हीं की कहानी…
20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में डोभाल का जन्म हुआ। पिता आर्मी में मेजर थे और मां उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एचएन बहुगुणा की चचेरी बहन। डोभाल की शुरुआती पढ़ाई अजमेर के इंडियन मिलिट्री बोर्डिंग स्कूल में हुई।
इसके बाद उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स किया। 1968 में उन्होंने UPSC की परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में IPS के लिए चुन लिए गए। तब उनकी उम्र 22 साल थी।
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद डोभाल को केरल कैडर मिला। पहली पोस्टिंग कोट्टायम में ASP के पद पर हुई।
लेकिन अभी डोभाल का सबसे बड़ा इम्तहान बाकी था…
तारीख 29 दिसंबर 1971…
रात के डेढ़ बज रहे थे। जगह थी केरल के कन्नूर जिले का थालास्सेरी शहर। सड़क से एक धार्मिक जुलूस गुजर रहा था। नारे लग रहे थे। तभी पास के एक होटल की छत से जुलूस पर एक चप्पल आ गिरी।
होटल का मालिक मुसलमान था। भीड़ होटल पर टूट पड़ी। वहां तोड़फोड़ की, आसपास के मकानों को निशाना बनाया और मस्जिदों पर हमले किए।
अगली सुबह हिंदुओं की दुकानें तोड़ी जाने लगीं, सामान लूटा गया और मंदिरों में तोड़फोड़ हुई। इसी दौरान एक अफवाह फैली- ‘मुस्लिमों ने हिंदू महिलाओं पर हमला कर दिया है।’
दंगा और भड़क गया। अगले दिन मुस्लिमों की दुकानें लूट ली गईं, कई मस्जिदों को नुकसान पहुंचा। हालात इतने खौफनाक थे कि पुलिस वाले भी वहां जाने से कतरा रहे थे।
तब केरल में वामदलों की सरकार थी और कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी।
गृहमंत्री के. करुणाकरण ने अफसरों की मीटिंग बुलाई। उन्होंने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा, ‘थालास्सेरी जल रहा है। सीएम साहब हर घंटे रिपोर्ट मांग रहे हैं। मुझे हर हाल में सख्त एक्शन चाहिए।’
तभी मालाबार के कमांडेंट एके. वासुदेवन अपनी कुर्सी से उठे, ‘सर, एक IPS है। सर्विस को अभी तीन साल हुए हैं, लेकिन बंदा बेखौफ है। वह हालात संभाल लेगा।’
गृहमंत्री ने पूछा, ‘कौन है वो?’
‘ASP अजीत डोभाल।’ वासुदेवन ने जवाब दिया।
2 जनवरी 1972 की दोपहर। सड़कों पर जला हुआ सामान, कांच के बिखरे टुकड़े और सन्नाटे में उठता धुआं।
अजीत डोभाल सादे कपड़ों में अकेले ही उन गलियों में टहल रहे थे। तभी उनकी नजर खिड़की से झांक रहे एक लड़के पर पड़ी। डोभाल उसकी तरफ बढ़े। लड़के ने डर के मारे दरवाजा बंद कर लिया।
डोभाल ने कहा, ‘डरो मत। मैं पुलिस से हूं।’
डोभाल अंदर गए और इत्मीनान से बैठकर उससे बात की।
उसी रात डोभाल ने कंट्रोल रूम में मीटिंग बुलाई। टेबल पर नक्शा बिछाया और उंगली रखते हुए अफसरों को समझाया, ‘हिंसा की पूरी स्क्रिप्ट इन्हीं चार ठिकानों से लिखी जा रही है। अगर इन पॉइंट्स पर फोर्स तैनात कर दी जाए, तो उपद्रवी बाहर नहीं निकल पाएंगे।’
4 जनवरी की सुबह डोभाल ने दोनों पक्षों के नेताओं को आमने-सामने बिठाया। उन्होंने सीधे मुद्दे की बात की, ‘हिंसा रुकने की क्या कीमत है?’
एक उपद्रवी ने गुस्से में टेबल पर हाथ पटका, ‘हमारी दुकानें लूट ली गईं। हमारा सामान वापस चाहिए।’
डोभाल ने कहा, ‘मंजूर है, लेकिन इसके बाद एक भी पत्थर चला… तो नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना।’
5 से 8 जनवरी के बीच थालास्सेरी की गलियों का नजारा बदलने लगा। पुलिसकर्मी संदूक, सिलाई मशीनें, बर्तन और लूटा हुआ सामान गाड़ियों में लादकर थाने लाने लगे।
9 जनवरी तक दंगा थम चुका था। दुकानें खुलने लगीं। लोग बेखौफ घूमने लगे। कमांडेंट वासुदेवन तक ये खबर पहुंची, तो उन्होंने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा- ‘कमाल कर दिया लड़के ने… बिना गोली चलाए पूरा शहर शांत कर दिया।’

यहां से डोभाल एक अलग ही दुनिया में जाने वाले थे…
केरल के DGP ने दंगे की रिपोर्ट तैयार की। जब यह रिपोर्ट सरकार के पास पहुंची, तो डोभाल की स्ट्रेटजी की तारीफ हुई। धीरे-धीरे बात दिल्ली तक पहुंच गई।
तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री। उसी साल मई-जून में डोभाल को दिल्ली बुला लिया गया। उन्हें इंटेलिजेंस ब्यूरो के ‘डायरेक्ट ऑपरेशन विंग’ में शामिल कर लिया गया।
उस वक्त मिजोरम हिंसा की आग में सुलग रहा था। उग्रवादियों ने कई शहरों पर कब्जा कर लिया था और अलग देश की घोषणा कर दी थी।
और इसमें चूहों की बहुत बड़ी भूमिका थी…पूरी कहानी के लिए फ्लैशबैक में चलते हैं…
बात 1959 की है। तब मिजोरम, असम का हिस्सा हुआ करता था। उस साल एक खास प्रजाति के बांसों में फूल खिले। इस फूल को खाने से चूहों की प्रजनन क्षमता अचानक बढ़ जाती है। उस साल भी ऐसा ही हुआ।
बांस के फूल खत्म हो गए, तो चूहों ने अनाज खाना शुरू कर दिया।
कुछ ही महीनों में चूहे खेतों की फसलें और गोदाम में रखे आनाज चट कर गए। मिजोरम में भूखमरी फैल गई। लोग सड़कों पर उतर आए, लेकिन फौरी तौर पर केंद्र से मदद नहीं मिली।
इसी गुस्से के बीच एक चेहरा निकला- लालडेंगा। आजादी से पहले इंडियन आर्मी में रहे लालडेंगा ने चिल्लाकर कहा- ‘हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।’
उसने मिजो नेशनल फ्रंट बनाकर सरकार से आरपार की लड़ाई छेड़ दी।
इसी दौरान सरकार ने असम राइफल्स की दो बटालियनों को बर्खास्त कर दिया। बर्खास्त होने के बाद इन बटालियनों के 7 चीफ कमांडरों ने अपनी वर्दियां उतारीं और लालडेंगा के खेमे में शामिल हो गए।
आंदोलन अब सशस्त्र विद्रोह बन चुका था। देखते ही देखते 1966 तक MNF की 8 मजबूत बटालियनें तैयार हो गईं।

28 फरवरी, 1966 की रात…
पहाड़ों में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी। उग्रवादियों ने असम राइफल्स और BSF की चौकियों पर धावा बोल दिया। सड़कें बंद करने के लिए बड़े-बड़े पेड़ काट गिराए गए, पुलों को धमाकों से उड़ा दिया।
चंफाई में असम राइफल्स के ठिकाने पर आधी रात को हमला इतनी तेज और अचानक हुआ कि जवानों को राइफलें लोड करने तक का मौका नहीं मिला।
उग्रवादियों ने 6 लाइट मशीन गन, 70 राइफलें, 16 स्टेन गन और ग्रेनेड फायर करने वाली 6 राइफलें लूट लीं। एक अफसर और 85 जवानों को बंदी बना लिया। टेलीफोन एक्सचेंज जाकर सारे कनेक्शन काट दिए। आइजोल का संपर्क पूरे देश से कट गया।
अगली ही सुबह, 1 मार्च 1966 को लालडेंगा ने एक अलग और स्वतंत्र मिजोरम की घोषणा कर दी।
पाकिस्तान की शह पर विद्रोहियों ने 48 घंटे के भीतर आइजोल पर अपना झंडा फहराने की ठान ली थी। पाकिस्तान ने वादा किया था कि वह इस नए देश की जंग को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाएगा।
अब आइजोल में असम राइफल्स का मुख्यालय ही भारत का आखिरी किला बचा था। MNF के लड़ाकों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था। अगर वह कैंप ढह जाता, तो मिजोरम पर उग्रवादियों का कब्जा हो जाता।
अब भारत पहली बार अपने ही लोगों पर बमबारी करने जा रहा था…
तब असम और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। इंदिरा गांधी को देश की बागडोर संभाले अभी महज 40 दिन हुए थे।
5 मार्च, सुबह 11:30 बजे… भारतीय वायुसेना ने उग्रवादियों के ठिकानों पर बमबारी शुरू कर दी। 13 मार्च तक आइजोल और उसके आसपास के इलाकों पर बम गिराए जाते रहे। 13 लोग मारे गए। जान बचाकर ज्यादातर उग्रवादी म्यांमार और पूर्वी पाकिस्तान यानी अब के बांग्लादेश के जंगलों में छुप गए।
21 जनवरी 1972 को मिजोरम को असम से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। सरकार को लगा कि उग्रवाद थम जाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ।
अब लाल डेंगा और उसके लड़ाके गुरिल्ला वॉर के जरिए हमला करने लगे। चीन और पाकिस्तान से उन्हें गुपचुप हथियार और पैसा मिल रहा था।
यहां से अब मिजोरम मिशन में भारत की खुफिया एजेंसी RAW की एंट्री हुई…
अजीत डोभाल कुछ ही महीने पहले शादी करके लौटे थे। उन्हें ‘सब्सिडरी इंटेलिजेंस ब्यूरो’ यानी SIB चीफ बनाकर मिजोरम भेजा गया। डोभाल ने वहां आम लोगों की तरह रहना शुरू किया। अलग-अलग इलाकों में घूमना शुरू किया।

डोभाल ने जल्द पता लगा लिया- ‘लालडेंगा की असली ताकत वे सात कमांडर हैं… लेकिन उनके बीच मतभेद और आंतरिक कलह चल रही है।’
अब डोभाल का दिमाग दौड़ा।
एक शाम की बात है। भारत-म्यांमार बॉर्डर पर घने जंगलों में बना उग्रवादियों का कैंप। मशीनगन और एके-47 लिए उग्रवादी कमांडर बैठे हुए थे। अचानक, झाड़ियों से सरसराहट हुई। उग्रवादी कमांडर तनकर खड़े गए। राइफलें लोड कर लीं।
अजीत डोभाल सामने खड़े थे।
उग्रवादियों ने डोभाल के सीने पर निशाना साधते हुए कहा- ‘एक कदम और आगे बढ़ाया तो यहीं ढेर कर देंगे।’
डोभाल ने दोनों हाथ ऊपर कर लिए।
उग्रवादी- कौन हो तुम?
डोभाल ने कहा- ‘मैं रसद और सामान लेकर आया हूं।’
उग्रवादी कमांडर की उंगली ट्रिगर पर कस गई। ‘झूठ बोल रहा है ये। दिल्ली का जासूस है, इसे यहीं काट डालो।
डोभाल ने अपना भारी बैग जमीन पर पटका और जिप खोल दी। एंटीबायोटिक दवाइयां, बारूद और सिगरेट के पैकेट… उग्रवादियों को हफ्तों से ऐसी चीजों की तलाश थी।
अब डोभाल ने ठंडे लहजे में कहा- ‘मुझे मुखबिरी ही करनी होती, तो मैं अकेले इस जंगल में अपना जनाजा लेकर नहीं आता।’
कमांडर एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। फिर अपने हथियार नीचे कर लिए। डोभाल को कैंप के भीतर बुला लिया और घंटों बातें हुईं।
इसके बाद डोभाल अक्सर उग्रवादियों के कैंपों में आने लगे। उनके साथ बैठकर शराब पीने लगे।

धर्मसंकट में फंस गईं डोभाल की पत्नी…
उग्रवादी धीरे-धीरे डोभाल के साथ खुलने लगे थे, लेकिन कुछ कमांडरों को अब भी उनपर शक था। डोभाल को हर हाल में उनका भरोसा जीतना था।
एक शाम डोभाल, लाल डेंगा कैंप के सातों कमांडरों को अपने घर ले गए। उन्हें अलग कमरे में बैठाया और सीधे किचन में चले गए।
‘सुनो, ये मेरे बहुत खास दोस्त हैं। रात का खाना हमारे साथ खाएंगे।’ डोभाल ने एक थैला पत्नी की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
डोभाल की पत्नी ने थैला थामते हुए कहा- क्या है इसमें?
डोभाल ने थोड़ा रुककर धीमे से कहा- ‘सु…सु…सुअर का मांस।’
‘क्या…?’ डोभाल की पत्नी के हाथ से थैला छूटकर नीचे गिर गया।
डोभाल ने जल्दी से थैला उठाया और धीरे से कहा- ‘प्लीज शोर मत करो।’
डोभाल की पत्नी ने खुद को संभालते हुए कहा- ‘हम नॉनवेज नहीं खाते और आप सुअर का मांस पकाने को बोल रहे हैं। मुझसे नहीं हो पाएगा।’
डोभाल ने पत्नी का हाथ थामते हुए कहा- ‘मुझे इन लोगों का भरोसा हर हाल में जीतना है। अगर आज हमने मना किया, तो सब बिगड़ जाएगा।’
डोभाल की पत्नी भारी मन मांस पकाने को राजी हो गईं। इधर, डोभाल कमांडरों के साथ बैठकर शराब पीने लगे।
थोड़ी देर बाद पत्नी ने आवाज लगाई- ‘खाना बन गया है।’
डोभाल रसोई से गरम-गरम सुअर का मांस और भात की प्लेटें उठाकर लाए और सातों कमांडरों को खाना परोस दिया। इसके बाद वे खुद भी उनके साथ बैठकर खाने लगे।
कमांडरों को यकीन हो गया कि यह कोई बाहरी आदमी नहीं है।
एक रोज डोभाल ने उन कमांडरों से कहा- ‘सरकार के एक खास आदमी से मेरी बात हुई है। यदि तुम लोग सरकार से हाथ मिलाते हो, तो मिजोरम को एक अलग राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। तुम लोगों को नई सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारियां दी जाएंगी।’
सातों कमांडर चुपचाप उनकी बातें सुनते रहे। थोड़ी देर बाद हिदायत भरे लहजे में डोभाल ने कहा- अगर तुम लोग बात नहीं मानते हो, तो इसमें तुम्हारा ही नुकसान है। फौज एक न एक दिन इन बीहड़ों में घुसेगी और सब कुछ नेस्तनाबूद कर देगी, तब तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा।’

1972 से 1974 के बीच मिजोरम और म्यांमार की बीहड़ पहाड़ियों में डोभाल जान जोखिम में डालकर उन कमांडरों को समझाते रहे।
आखिरकार, 7 में से 6 कमांडर भारत सरकार का साथ देने के लिए राजी हो गए।
6 कमांडरों के अलग होते ही लालडेंगा अकेला पड़ गया। बाद में वह भागकर लंदन चला गया, लेकिन डोभाल से उसका पीछा नहीं छोड़ा।
आखिरकार फरवरी 1976 में लालडेंगा दिल्ली आया। केंद्र सरकार के साथ एक समझौते पर दस्तखत किया और भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गया।
हालांकि, अंतिम सहमति बनती उससे पहले ही भारत में कई सियासी उलटफेर हो गए। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस हार गई। इंदिरा खुद अपनी सीट भी हार गईं।
जनता पार्टी के मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन यह सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चली। 1980 में इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन चार साल बाद उनकी हत्या कर दी गई।
आखिरकार 1986 में मिजो शांति समझौता हुआ और फरवरी 1987 में मिजोरम को राज्य का दर्जा मिल गया। लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।
दो साल बाद यानी 1989 को डोभाल को सैन्य सम्मान कीर्ति चक्र मिला, जो उस वक्त किसी पुलिस अधिकारी को मिलने वाला पहला कीर्ति चक्र था।






