
क्या आपने कभी रुककर ख़ुद से यह सवाल किया है कि आपका बुढ़ापा कैसा होगा? बुढ़ापा अचानक दस्तक नहीं देता, यह आज की यानी सक्रिय समय में की गई तैयारियों का ही परिणाम होता है।
बच्चों का सान्निध्य मिले तो जीवन और भी ख़ुशनुमा हो जाता है, लेकिन अगर वे दूर भी हैं, तो भी अपना जीवन सम्मान, सुरक्षा और अपनी शर्तों पर जिया जाना चाहेंगे ही आप। ज़िंदगी की दूसरी पारी का यह समय किसी का इंतज़ार करने का नहीं, बल्कि ख़ुद के लिए जीने की सुदृढ़ तैयारी करने का है।
इसलिए फिक्र छोड़कर, डॉ. दीपिका शर्मा, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, एशियन हॉस्पिटल की सलाह अनुसार आज ही अपने शानदार कल का ताना-बाना बुनना शुरू करें।

स्वावलंबन ही सच्चा संबल
सेवानिवृत्ति के बाद आमदनी का एक नियमित व सुनिश्चित ज़रिया होना ज़रूरी है, ताकि किसी के भी आगे हाथ न फैलाना पड़े। उम्र बढ़ने के साथ दवाइयों व स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की ज़रूरतें अचानक बढ़ भी सकती हैं। इसलिए अपने कामकाजी जीवन के दौरान ही निवेश, म्यूचुअल फंड्स, पेंशन योजना, स्वास्थ्य बीमा व आपातकालीन फंड आदि का दायरा मज़बूत और व्यापक कर लें। इसके साथ ही सभी वित्तीय जानकारियां जैसे- बैंक खातों के विवरण और निवेश से जुड़े दस्तावेज़ भी हमेशा व्यवस्थित और अद्यतन रखें, ताकि आपात स्थिति में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
घर को बनाएं उम्र के अनुकूल
आपका आशियाना एक उम्र के बाद आपके लिए असुरक्षित साबित हो सकता है। इसलिए इसे भी आराम और सुरक्षा दोनों के लिहाज़ से तैयार करें। फिसलने वाले चिकने फ़र्श, कम रोशनी वाले कॉरिडोर या असुरक्षित और ढलान वाली सीढ़ियां बुढ़ापे में बड़े हादसों का कारण बन सकती हैं। इसलिए सुरक्षा के लिहाज़ से ये बदलाव स्वयं ही 45 की उम्र तक करवा लें। यदि अकेले रहते हैं तो अपने पड़ोसियों, पुराने मित्रों और स्थानीय समुदाय का एक ऐसा भरोसेमंद नेटवर्क तैयार करें, जो ज़रूरत पड़ने पर एक कॉल या आवाज़ पर आपकी मदद के लिए तुरंत हाज़िर हो सके।
स्नेह अपार, पर आत्मबल आधार
संतानों से लगाव स्वाभाविक है, पर उन पर हर ज़रूरत के लिए पूरी तरह आश्रित होना सही नहीं है। इसलिए अपने मन में ये भाव न आने दें कि बच्चों का तो फर्ज़ ही है आपको संभालना, न ही दूसरों को देखकर ये भाव आए कि मेरे बच्चे मेरी सेवा क्यों नहीं करते। इसके अलावा बच्चों के साथ भविष्य की उम्मीदों, अपनी निवास, प्राथमिकताओं और किसी भी संभावित मेडिकल इमरजेंसी के बारे में हमेशा साफ़ और स्पष्ट बातचीत करें। जब आप अपनी इच्छाओं के बारे में पारदर्शी चर्चा करते हैं, तो इससे रिश्तों में किसी भी प्रकार की ग़लतफ़हमी या खटास की कोई गुंजाइश नहीं बचती, बल्कि आपसी समझ, परिपक्वता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अधिक गहरा हो जाता है।
मन चंगा तो जीवन बहुरंगा
ज़िम्मेदारियों का भारी बोझ उतरने के बाद अक्सर लोगों के जीवन में एक सन्नाटा और ख़ालीपन छा जाता है। इसलिए समझें कि ‘अकेले रहना’ और ‘अकेलापन महसूस करना’ दोनों अलग-अलग बातें हैं। अकेलेपन को मानसिक कमज़ोरी न बनने दें, इसे एकांत के उत्सव में बदलें। ख़ुद को मानसिक रूप से सक्रिय, तरोताज़ा और युवा बनाए रखने के लिए अपनी उन भूली हुई रुचियों और कलाओं को (जैसे- किताबें पढ़ना, बाग़वानी करना, चित्रकारी या संगीत सीखना, यात्रा या सामाजिक कार्य पर जाना) दोबारा ज़िंदा करें जिन्हें आप नौकरी और परिवार की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए थे।
काग़ज़ी तैयारियां भी हैं ज़रूरी
वसीयत बनवाना, संपत्ति के तमाम काग़ज़ात, बैंक डिटेल्स, लॉकर की चाबियां और जीवन बीमा पॉलिसीज़ को सलीक़े से एक जगह सहेजकर रखना केवल कोई कानूनी औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि यह आपके और आपके परिवार के भविष्य के सुकून की गारंटी है। किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति को इन दस्तावेज़ों की जानकारी ज़रूर दें, जिससे असमर्थता की स्थिति में बिना किसी विवाद के पारदर्शी निर्णय लिए जा सकें।






