
चीफ साहब को पूर्व मंत्रीजी ने ‘आखिरी सलाम’ वाला मैसेज भी कर डाला। हालांकि डोटासरा जी का कहना है कि ‘वे तो मुझसे प्यार करते हैं’। डोटासरा को भीलवाड़ा में भी इसी तरह डैमेज कंट्रोल करना होगा। अलवर में मेयर के प्रोग्राम से वनमंत्री खफा होकर चल पड़े। मेयर पति के दौड़ लगाने पर भी नहीं रुके।
राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में…
1. ‘अलविदा’ और ‘प्यार’

राजनीति में अहम मौकों पर आत्मा की आवाज सुनी जाती है। आत्मा कभी-कभी ही पुकारती है। लेकिन जब पुकारती है तो घटनाक्रम का सिलसिला तैयार कर देती है।
यूं तो वे पूर्व मंत्री हैं और पिछला विधानसभा चुनाव हार गए। लेकिन पूर्व राजपरिवार से होने के कारण उनका काफी रुतबा है। राजनीति में उन्होंने 40 साल से ज्यादा समय बिताया।
इस दौरान दोनों प्रमुख दलों में रहकर पदों को शोभायमान किया। बीते हुए राजतंत्र के असर के चलते बगावत करना उनका रुचिकर विषय है। पिछले शासनकाल में पार्टी के एक धड़े के साथ उन्होंने दिल्ली कूच कर दिया था। बाद में उन्हें मना लिया गया और सरकार बच गई।
विधानसभा चुनाव हारने के बाद वे स्वास्थ्य और निजी परेशानियों से भी गुजरे। लेकिन वक्त के साथ सब ठीक हो गया। उनकी नजर में जो ठीक नहीं हुआ वह था भरतपुर और डीग के जिलाध्यक्षों की कार्यशैली।
साथ ही निकाय चुनाव में जिन्हें टिकट दिया गया, उन्होंने भरतपुर में भद पिटवा दी। इसी बात को आधार बनाकर उन्होंने चीफ साहब को घेर लिया।
सिर्फ घेरा नहीं, बल्कि भयंकर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री से जांच तक की मांग कर दी। मन की भड़ास निकाल लेने के बाद उन्होंने संगठन के मुखियाजी से कह दिया कि अब आपसे अलविदा ले ली जाए इसी में भलाई है।
अलविदा को उनका इस्तीफा मानकर खबर उड़ा दी गई कि ‘राजा साहब’ ने कांग्रेस छोड़ दी। कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने प्रजा जैसा भाव दिखाते हुए सोशल मीडिया के मैदान में पोस्टों के घुड़सवार छोड़ दिए।
लिखा- हुकुम। आपका स्वाभिमान हमारा मान है। आप जो इशारा कर देंगे, हम वही कर डालेंगे।
कुल मिलाकर जो डैमेज हो रहा था वह कंट्रोल के दायरे से बाहर निकलता जा रहा था। उस पर चीफ साहब ने ‘टूलकिट’ का नाम देकर आग में घी डाल दिया था। लेकिन बाद में उनके तेवर नरम दिखे। उन्होंने कहा कि विश्वेंद्र जी तो मुझसे बहुत प्यार करते हैं। आशीर्वाद बनाए रखते हैं। सोशल मीडिया का क्या भरोसा, उनसे बात होगी तो सब साफ हो जाएगा।

पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा पर कई आरोप लगाते हुए कांग्रेस पार्टी छोड़ने के संकेत दिए। इस पर डोटासरा ने कहा कि विश्वेंद्र सिंह मुझसे प्यार करते हैं।
2. मेयर पति को ‘डेकोरम’ का सबक
अगर आपका कोई प्रियजन, जानकार, छोटा भाई, बड़ा भाई, जिगरी यार, लंगोटिया आदि मंत्री पद की शपथ ले ले, तो यह मानकर उससे प्रियजन, जानकार, छोटा भाई, बड़ा भाई, जिगरी यार, लंगोटिया जैसा व्यवहार मत कीजिएगा।
आपको यह ध्यान रखना पड़ेगा कि अब उसका एक प्रोटोकॉल है और वह एक डेकोरम मेंटेन करता है। अगर आपने यारी-दोस्ती में डेकोरम बिगाड़ने की कोशिश की। तो हो सकता है कि छोटा भाई बिगड़कर निकल जाए और आप सोचते रह जाएं कि आखिर हुआ क्या?
यह ज्ञान इसलिए झाड़ना पड़ा क्योंकि अलवर में मेयर के पतिदेव के साथ ऐसा ही हुआ। गांधी जयंती पर छोटा सा प्रोग्राम मेयर की ओर से किया गया था। प्रोग्राम में वन मंत्रीजी भी पहुंचे। उन्होंने गांधीजी-शास्त्रीजी की तस्वीरों पर फूल चढ़ाए, गांधीजी की मूर्ति को माला पहनाई और सीधे कार की ओर चल पड़े। न मेयर से कुछ कहा और न मेयर-पति से।
बात फैल गई कि मंत्रीजी नाराज होकर जा रहे हैं। मेयर-पति को पता चला तो कार की तरफ ‘रोको-रोको’ चिल्लाते हुए दौड़े। आवाज को अनसुना कर मंत्रीजी रवाना हो गए।
जिन मंत्रीजी महोदय ने मेयर चुने जाने के बाद रो-रोकर अपनी भावनाएं जाहिर की थी, वे इस तरह नाराज होकर चल दें, ये कैसे हो सकता है?
घबराए मेयर-पति ने पत्नी को साथ लिया और सीधे साहब के बंगले पर पहुंच गए। वहां जैसा कि हर नाराज व्यक्ति दावा करता है कि कैसी नाराजगी? मैं तो परिवार का बच्चा हूं। मैं तो आपका छोटा भाई हूं। आप तो मेरे बड़े हैं। हम तो एक ही परिवार के सदस्य हैं।
ऐसे ही दावे मंत्रीजी की ओर से किए गए। मेयर-पति ने राहत की सांस ली। लेकिन उन्हें घटनाक्रम का कुछ-कुछ अंदाजा हो गया। वे खिसियानी सी घबराहट के साथ बोले- हमने तो अभी नया-नया काम संभाला है, प्रोटोकॉल जानते नहीं। बाकी मंत्री का डेकोरम होता है। आगे से उसका ध्यान रखेंगे।

अलवर में मेयर के प्रोग्राम से वनमंत्री अचानक चल पड़े। मेयर पति अजय अग्रवाल ने पीछे दौड़कर उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन रुके नहीं।
3. भीलवाड़ा में भी ‘डैमेज-कंट्रोल की मांग’
सयुंक्त परिवार टूट कर बिखर चुके। अब तो परिवार के 4 सदस्यों को भी एकजुट रखना टेढ़ी खीर है। ऐसे में सोचिए कि संगठन का मुखिया कैसे मैनेज करता होगा?
एक तरफ भरतपुर वाले नेताजी ‘राजा साहब’ बने हुए हैं तो दूसरी तरफ भीलावड़ा में निकाय चुनाव की हार को पीसीसी सदस्य पचा नहीं पा रहे हैं।
भीलवाड़ा में कांग्रेस के 17 सिंबल ऐन वक्त तक नहीं पहुंचे थे। इस पर कांग्रेस के ही मनोज पालीवाल ने आरोप लगाया दिया कि मुखियाजी ‘मैनेज’ हो गए।
अब हार का ठीकरा प्रदेशाध्यक्ष पर फोड़ते हुए कभी हवन-यज्ञ कर रहे हैं, कभी चरखा चला रहे हैं, कभी गूंगे-बहरे-अंधे प्रतीक बनाकर गांधीजी की ‘लाठी’ थामे भजन गाते चल रहे हैं।
एक युवक के आंखों पर पट्टी, दूसरे के कानों पर और तीसरे के मुंह पर पट्टी बांधकर पालीवाल जी ने शहर का दौरा किया। जो देखे वही अचंभा करे।
पूछने पर आहत स्वर में बोले- संगठन का नेतृत्व इन्हीं तीन बंदरों के समान हो चुका है। उन्हें न दिखाई देता है, न सुनाई देता है और न वे कुछ बोलते हैं।

गांधी जयंती पर प्रतीकों के साथ रैली निकालते कांग्रेस नेता मनोज पालीवाल।
4. चलते-चलते..
नेतागण जब सड़कों पर उतरने लगें तो समझ लीजिए कि चुनाव नजदीक हैं। किसानों का मुद्दा लेकर कोटा के इटावा में पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल ने भी सिर पर आसमान उठाया हुआ है।
वे कहते नहीं हैं, ललकारते हैं। उनकी भाषा में ही सारे हथियार अस्त्र-शस्त्र होते हैं। इटावा में खाद, नहर के पानी, फसल खराबे को लेकर किसान हुंकार रैली हुई थी।
रैली के जरिए गुंजल जी खूब गूंजे। आर-पार की जंग की चेतावनी दे दी। सरकार को घेरा। नेताओं पर आरोप लगाए। सभा में मन की भड़ास भली-भांति निकालने के बाद वे रैली के रूप में एसडीएम कार्यालय की तरफ बढ़े।
चूंकि वे खुद को फायरब्रांड नेता मानते हैं, ऐसे में उनका मानना है कि एसडीएम और डिप्टी एसपी को भी उन्हें फायरब्रांड ही मानना चाहिए और अपने दफ्तर छोड़कर जहां वे धरना दे रही हैं, वहीं आकर चुपचाप ज्ञापन ले लेना चाहिए।
दुर्भागय से एसडीएम और डिप्टी एसपी ऐसा नहीं मानते, वे अपने दफ्तरों में कुर्सियों पर काबिज रहे। उन्होंने नियम से चलने का प्रयास किया और कह दिया कि पांच लोग आकर ज्ञापन दे दो।
जब तक नेताजी के चारों ओर जन-सागर न हो, और उस जन-समुद्र में लहरें न उठ रही हों, तब तक ज्ञापन देने में क्या आनंद है। इसी नियम को याद रखते हुए उन्होंने मौके पर एसडीएम और डिप्टी को बुलाया था।
दवाब बढ़ने लगा तो अधिकारी बाहर निकले। गुंजल ने उन्हें फटकारते हुए कहा- धरने पर कोई लल्लू पंजू नहीं बैठा। प्रहलाद गुंजल बैठा है। राज आने दो, तुमको टांग दूंगा। बाहर आने में जोर आ रहा था?

कोटा के इटावा में धरने पर बैठे पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल।






