
जून 1985 का एक दिन। दिल्ली का पांच सितारा अशोका होटल। समय- दोपहर के करीब 2 बजे। होटल की पांचवीं मंजिल पर अचानक हलचल बढ़ गई। गलियारे को एसपीजी जवानों ने घेर लिया। आने-जाने वाले हर शख्स पर नजर। सबसे ज्यादा सुरक्षा कमरा नंबर- 518 के आसपास।
तभी एसपीजी के घेरे में तीन लोग कमरा नंबर-518 की तरफ बढ़े। सबसे आगे चल रहा शख्स करीब साढ़े पांच फीट लंबा। सांवला रंग। वह धीरे-धीरे कमरे के दरवाजे तक पहुंचा।
दरवाजा खुला। तीनों अंदर गए। आगे चल रहे शख्स ने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई और एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। बाकी दोनों साथी, महिंद्रराजा उर्फ महात्या और एंटोन बालासिंगम उसके पीछे खड़े हो गए।

तभी आईबी अफसरों की नजर तीनों के गले पर पड़ी। उनके गले में काले धागे से बंधी कांच की शीशियां लटक रही थीं। पहली नजर में वह किसी ताबीज जैसी लग रही थीं।
एक अफसर ने चौंककर पूछा- ये क्या है?
जवाब मिला- साइनाइड। साइनाइड एक ऐसा केमिकल होता है, जिसे मुंह में रखते ही मिनटों में मौत हो जाती है।

लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन के गले में साइनाइड की शीशी (लाल घेरे में)।
अफसर सोच में पड़ गए कि यह गले में मौत का सामान लटकाकर क्यों घूम रहा है?
दरअसल, जिस शख्स के गले में यह कैप्सूल था, उसे कुछ देर बाद भारत के प्रधानमंत्री से मिलना था। नाम था- वेलुपिल्लई प्रभाकरन। वही प्रभाकरन, जो लिट्टे यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम का प्रमुख था। प्रभाकरन और लिट्टे श्रीलंका में तमिल भाषियों के लिए अलग देश की मांग के लिए वहां की फौज से लड़ रहे थे।
अब एसपीजी से घिरे प्रभाकरन और उसके साथियों को होटल से बाहर निकाला गया। वाहनों का काफिला काफिला 7, रेसकोर्स रोड की ओर बढ़ा। तब प्रधानमंत्री आवास का यही पता था।
कुछ देर बाद, काफिला प्रधानमंत्री आवास पहुंच गया।
प्रभाकरन और उसके साथियों को अंदर ले जाया गया। तीनों को एक कमरे में बैठा दिया गया।
कुछ देर बाद एक अधिकारी कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने प्रभाकरन और उसके साथियों के गले में लटके कैप्सूल की तरफ इशारा किया। कहा- ‘इसे उतार दीजिए।’
दोनों साथियों ने चुपचाप कैप्सूल उतार दिए, लेकिन प्रभाकरन ने कैप्सूल कसकर पकड़ लिया। बोला- ‘यह मेरी सुरक्षा के लिए है, इसे नहीं उतार सकता’
अधिकारी ने समझाया- ‘यहां कोई खतरा नहीं है। उतार दीजिए।’
वह फिर बोला- ‘नहीं।’
अधिकारी समझाते रहे। प्रभाकरन नहीं माना। करीब 45 मिनट तक यही चलता रहा। आखिर सुरक्षा अधिकारी दूसरे कमरे में पहुंचे, वहां प्रधानमंत्री राजीव गांधी मौजूद थे। अधिकारियों ने राजीव को साइनाइड कैप्सूल वाली बात बताई।
कुछ पल खामोशी के बाद राजीव बोले- ‘उसे कैप्सूल के साथ ही आने दो।’
अफसर घबराकर बोले- ‘सर, सिक्योरिटी का मामला है। खतरा हो सकता है…’
राजीव ने बात काटी और बोले– ‘कोई गड़बड़ नहीं होगी।’
अधिकारी फिर प्रभाकरन के कमरे में पहुंचे।
प्रभाकरन से बोले- ‘ठीक है, कैप्सूल मत उतारो, लेकिन एक शर्त है। तुम्हारे करीब हमारे दो कमांडो रहेंगे।’
प्रभाकरन ने कहा- ‘मंजूर है।’
अगली मुश्किल थी- प्रधानमंत्री और प्रभाकरन के बीच कितनी दूरी रखी जाए?
अधिकारियों ने कमरे के बीचों बीच मेज रखी ताकि दूरी इतनी रहे एक-दूसरे को छू न सकें। फिर प्रभाकरन को अंदर लाने का मैसेज भेजा गया।
वह सोफे से उठा। शर्ट ठीक की और दूसरे कमरे की तरफ बढ़ा। पीछे उसके दोनों साथी थे।
दरवाजा खुला। कुछ अफसर पहले अंदर गए। फिर प्रभाकरन ने कमरे में कदम रखा। सामने बैठे शख्स को देखा। अभिवादन किया। सामने थे प्रधानमंत्री राजीव गांधी।
राजीव ने प्रभाकरन को सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

28 जुलाई को पीएम आवास में राजीव गांधी के साथ प्रभाकरन (सबसे दाएं) और उसके साथी महात्या और एंटोन बालासिंघम।
एक तरफ राजीव गांधी, दूसरी तरफ प्रभाकरन और दोनों के बीच दो बड़ी मेजें। कुछ पल खामोशी रही। फिर राजीव ने कहा- ‘प्रभाकरन, मुझे लगता है तुम्हें हथियार डाल देने चाहिए।’
प्रभाकरन ने सामने देखा। ‘हथियार तो डाल दें, लेकिन हमारी मांगों का क्या?’
राजीव ने प्रभाकरन को उस समझौते की शर्तें समझानी शुरू कीं, जिसमें श्रीलंका के तमिलों को राजनीतिक अधिकार देने की बात थी। प्रभाकरन चुपचाप सुनता रहा।
फिर प्रभाकरन ने तीन खास सवाल पूछे-
पहला- ‘अगर श्रीलंका सरकार अपना वादा तोड़ दे तो?’ दूसरा- ‘तमिलों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?’ तीसरा- ‘लिट्टे के खिलाफ श्रीलंकाई सेना कब हटेगी?’
राजीव सुनते रहे, समझाते रहे। एक घंटे बात चली, लेकिन प्रभाकरन अलग देश की मांग पर अड़ा रहा। राजीव चाहते थे कि तमिलों को श्रीलंका में ही राजनीतिक अधिकार मिलें। बातचीत खत्म हुई। प्रभाकरन वापस श्रीलंका चला गया।
अब इस वाक्ये के पीछे की कहानी को समझने के लिए करीब चार दशक पीछे जाना होगा।
कहानी शुरू होती है 1948 से- इसी साल श्रीलंका आजाद हुआ था।
आजादी के बाद बहुसंख्यक सिंहली बौद्धों और अल्पसंख्यक तमिल हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ने लगा- भाषा, शिक्षा, नौकरी, राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष गहराता गया। शुरुआत में मांगें राजनीतिक थीं, पर धीरे-धीरे तमिल युवाओं में विद्रोह पनपने लगा।
1970 के दशक तक कई सशस्त्र संगठन सामने आ चुके थे- इन्हीं में से एक था लिट्टे, जिसकी कमान 1976 से प्रभाकरन ने संभाली। उसका लक्ष्य श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में अलग तमिल राष्ट्र, तमिल ईलम बनाने का था।
समय बीतता गया, लिट्टे श्रीलंका का सबसे ताकतवर तमिल अलगाववादी संगठन बन गया।
फिर आया 1983। 23 जुलाई को जाफना के तिरुनेलवेली इलाके में श्रीलंकाई सेना का एक गश्ती दल गुजर रहा था। लिट्टे की बिछाई बारूदी सुरंग में धमाका हुआ, गोलियां बरसीं- कुछ मिनटों में सिंहली बाहुल्य सेना के 13 सैनिक मारे गए।

छिपकर गुरिल्ला हमले करते लिट्टे के लड़ाके। (सोर्स: अल जजीरा)
अगले दिन सैनिकों के शव कोलंबो लाए गए। सरकार जल्द अंतिम संस्कार चाहती थी- डर था भीड़ जुटी तो हालात बिगड़ेंगे। पर तब तक खबर पूरे देश में फैल चुकी थी।
कोलंबो में तमिलों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। भीड़ तमिल बस्तियों में घुसी, लोगों को घरों से निकालकर मारा गया, महिलाओं-बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, घर-दुकानें-कारखाने जलाए गए। हिंसा कोलंबो से निकलकर बाकी हिस्सों में भी फैल गई- एक हफ्ते चली इस हिंसा को ब्लैक जुलाई नाम दिया गया।
तमिलों को लगने लगा, श्रीलंका में रहना मुश्किल है। जान बचाने लोग समुद्र पार कर तमिलनाडु आने लगे।
भारत के सामने नई चुनौती खड़ी हुई- शरणार्थियों के साथ कहीं लिट्टे के लड़ाके भी न घुस आएं, वरना श्रीलंका की आग भारत तक पहुंच सकती थी।
उधर श्रीलंका सरकार ने लिट्टे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तेज कर दी। अगले कुछ वर्षों में हालात ऐसे बने कि भारत को खुद इस संघर्ष में उतरना पड़ा।

तारीख थी – 26 मई 1987। श्रीलंका सरकार ने जाफना के वडामाराच्ची इलाके पर कब्जे के लिए बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया- नाम था ऑपरेशन लिबरेशन। सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी।
इधर, दिल्ली में राजीव गांधी के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं।
पहली- तमिलों को श्रीलंका में राजनीतिक अधिकार दिलाना। दूसरी- श्रीलंका को टूटने से बचाना।
राजीव चाहते थे लिट्टे हथियार छोड़े, बातचीत की मेज़ पर लौटे- क्योंकि श्रीलंका टूटा तो तमिलनाडु में भी अलगाववाद भड़कने का खतरा था। इसलिए उन्होंने सैन्य नहीं, राजनीतिक रास्ता तलाशना शुरू किया।
भारत और श्रीलंका के बीच बातचीत शुरू हुई। कई दौर की बातचीत के बाद शांति समझौते का मसौदा तैयार हुआ, लेकिन असली पेंच बाकी था।
समझौता तभी जमीन पर उतर सकता था, जब लिट्टे इसे माने। लेकिन लिट्टे को मनाना आसान नहीं था।
सवाल था- प्रभाकरन को कौन मनाएगा?
राजीव चाहते थे कि प्रभाकरन भारत आए और खुद समझौते की शर्तें सुने। प्रभाकरन को डर था कि भारत कहीं उसे जाल में न फंसा दे।
भारत ने सुरक्षा की गारंटी दी। आखिर वह तैयार हुआ।
24 जुलाई 1987 की सुबह। श्रीलंका के जाफना के अम्मन मंदिर में भारतीय वायुसेना का हेलिकॉप्टर खड़ा था। प्रभाकरन दो साथियों के साथ पहुंचा और हेलिकॉप्टर भारत के लिए उड़ गया। पहला पड़ाव था तमिलनाडु का त्रिची, फिर दिल्ली।
दिल्ली में खुद राजीव उसका इंतजार कर रहे थे। अशोका होटल के कमरा नंबर- 518 में प्रभाकरन को ठहराया गया। अगले चार दिनों तक होटल और प्रधानमंत्री आवास के बीच बातचीत के कई दौर चले।
पांचवें दिन कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी गूंज 4 साल बाद सुनाई देने वाली थी।
प्रभाकरन को श्रीलंका लौटना था, तभी राजीव ने उसे दूसरी बार मिलने बुला लिया। राजीव 17 साल के बेटे राहुल के साथ मौजूद थे।
प्रभाकरन आया तो राजीव ने राहुल से कहा- ‘अंदर से मेरी बुलेटप्रूफ जैकेट लेकर आओ।’
राहुल जैकेट ले आए। राजीव ने उसे प्रभाकरन की ओर बढ़ाया, कंधों पर हाथ रखकर मुस्कुराए और बोले- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ’।
कमरे में मौजूद अफसर हैरान थे।
प्रभाकरन बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ निकल गया। उसके जाते ही अफसरों ने राजीव से पूछा- क्या उसने हथियार डालने का वादा किया है?
राजीव ने कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’
पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब One Life Is Not Enough में इसका जिक्र किया है। नटवर सिंह ने पूछा था- क्या प्रभाकरन से लिखित सहमति ली गई?
राजीव ने नाराजगी से कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’ लेकिन नटवर सिंह को उसके कहे पर भरोसा नहीं था।
एमआर नारायण स्वामी ने The Rout of Prabhakaran में लिखा है कि कुछ भारतीय अधिकारियों ने सलाह दी थी कि लिट्टे के हथियार डालने तक प्रभाकरन को भारत में रखा जाए।
राजीव ने सलाह नहीं मानी और यहीं से कहानी ने करवट ली।
29 जुलाई 1987 को प्रभाकरन को जाफना पहुंचा दिया गया। इसके कुछ घंटे बाद राजीव गांधी कोलंबो रवाना हुए।
भारत-श्रीलंका शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते को जमीन पर उतारने के लिए भारत ने अपनी सेना भेज दी।
नाम था- इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी IPKF।
शुरुआत में सब सामान्य रहा, लेकिन प्रभाकरन हथियार डालने को तैयार नहीं था। सितंबर 1987 में लिट्टे ने हथियार डालने से इनकार कर दिया। अब भारतीय सेना और लिट्टे आमने-सामने थे।
10 अक्टूबर 1987 को IPKF ने लिट्टे के खिलाफ ऑपरेशन पवन शुरू किया। जाफना के जंगल और गांव युद्ध क्षेत्र में बदल गए। करीब दो साल संघर्ष चला। इस दौरान 1,165 भारतीय सैनिक मारे गए और 3,000 घायल हुए।
भारत में सवाल उठने लगे- जिस सेना को शांति कायम करने भेजा गया था, वह श्रीलंका के गृहयुद्ध में क्यों उलझ गई? अभियान लंबा होता गया और सरकार पर दबाव बढ़ता गया।
फिर 1989 में लोकसभा चुनाव आए। राजीव का श्रीलंका में सेना भेजने का फैसला, बोफोर्स समेत कई मुद्दे चुनाव में छाए रहे।
राजीव चुनाव हार गए, कांग्रेस को सिर्फ 197 सीटें मिलीं। वीपी सिंह की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी। सरकार ने भारतीय सेना को श्रीलंका से वापस बुलाने का फैसला लिया।
24 मार्च 1990 को आखिरी टुकड़ी भारत लौट आई। लिट्टे ने इसे अपनी जीत माना।
लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।
जुलाई 1990 में राजीव गांधी ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया कि सत्ता में लौटे तो भारत-श्रीलंका समझौता फिर लागू किया जा सकता है। जरूरत पड़ी तो सेना दोबारा श्रीलंका भेजी जा सकती है।

1987 में IPKF के कमांडर अमरजीत सिंह कालकट श्रीलंका के मुल्लैतिवु में IPKF अफसरों के साथ बात करते हुए। अक्टूबर 1987 तक स्थिति यह पैदा हो गई कि भारतीय शांति सेना का LTTE से सीधा टकराव होने लगा।
प्रभाकरन को डर गया कि राजीव सत्ता में लौटे तो भारतीय सेना फिर श्रीलंका आ सकती है। 1991 में देश फिर आम चुनाव के मुहाने पर था। राजीव कांग्रेस के चुनाव अभियान में जुटे थे।
21 मई 1991। रात करीब 10 बजे। तमिलनाडु का श्रीपेरंबुदूर। राजीव गांधी चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे। वह सुरक्षा घेरे से निकलकर लोगों के बीच जा रहे थे। कोई फूल दे रहा था। कोई हाथ मिलाना चाहता था।
इसी भीड़ में एक युवती खड़ी थी। कोड नेम था- धनु, असली नाम- थेनमोझी राजरत्नम। वह लिट्टे की आत्मघाती कैडर थी। उसके हाथ में फूलों की माला थी।
वह राजीव के सामने पहुंची। माला पहनाई। फिर पैर छूने के लिए झुकी। किसी को नहीं पता था कि उसके शरीर पर बम बंधा है।
अगले ही पल तेज धमाका हुआ। नारों से गूंज रहा मैदान अचानक धुएं, मलबे और चीखों से भर गया। राजीव गांधी समेत 17 लोगों की मौत हुई।
बाद की जांच, सीबीआई, जैन आयोग और अदालत की कार्यवाहियों में इस हत्या की साजिश के लिए लिट्टे और उसके प्रमुख प्रभाकरन को जिम्मेदार ठहराया गया।

राजीव गांधी की रैली में पहुंची धनु, साथ में कांग्रेस कार्यकर्ता लता कन्नन और उनकी बेटी कोकिला। श्रीपेरंबदूर की इसी रैली में आत्मघाती हमलावर धनु ने शरीर में बंधे बम से विस्फोट किया था। फोटो- AI जनरेटेड
1991 में कांग्रेस 244 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। बहुमत से दूर थी, लेकिन सरकार बनाने का मौका कांग्रेस को मिला औैर पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने।
4 साल पहले, जिस राजीव ने प्रभाकरन को अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनाई थी। कहा था- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ।’ उस वक्त किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही शब्द एक ऐसी घटना की याद बन जाएंगे।
इसके बाद हमेशा के लिए भारत की श्रीलंका नीति बदल गई।






