ऐसा मंदिर,जहां राक्षस का वध करने प्रकट हुए थे ‘शिव’:9 किमी पहाड़ी-पथरीला रास्ता पार कर पहुंचते हैं श्रद्धालु; बलराम ने की थी तपस्या

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सावन के चौथे सोमवार पर आज हम आपको हल्देश्वर महादेव के दर्शन करवाते हैं। यह प्राचीन मंदिर बालोतरा जिले के सिवाना क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि भगवान शिव यहां हल्दिया नाम के राक्षस का संहार करने के लिए स्वयं प्रकट हुए थे।

सावन के पूरे महीने यहां श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बालोतरा में छप्पन की पहाड़ियों को पार करना पड़ता है। यह यात्रा पैदल ही पूरी करनी होती है, जिसमें करीब तीन घंटे का समय लगता है।

यहां एक साथ सात दुर्गम पहाड़ दिखाई देते हैं, जिनकी चोटियों पर अक्सर बादल छाए रहते हैं। इसी कारण स्थानीय लोग इस क्षेत्र को ‘मिनी माउंट आबू’ भी कहते हैं। इन्हीं पहाड़ियों के बीच एक पहाड़ पर स्वयंभू रूप में प्रकट हुए हल्देश्वर महादेव विराजमान हैं।

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी।

पहले देखिए, ये 3 PHOTOS…

पहाड़ की चोटी पर स्थित हल्देश्वर महादेव मंदिर।

पहाड़ की चोटी पर स्थित हल्देश्वर महादेव मंदिर।

बालोतरा जिले के सिवाना के समीप छप्पन की इन्हीं पहाड़ियों में हल्देश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।

बालोतरा जिले के सिवाना के समीप छप्पन की इन्हीं पहाड़ियों में हल्देश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।

हल्देश्वर महादेव मंदिर का मार्ग खूबसूरत प्राकृतिक नजारों से भरा है। यहां जगह-जगह झरने और नाले बहते दिखाई देते हैं।

हल्देश्वर महादेव मंदिर का मार्ग खूबसूरत प्राकृतिक नजारों से भरा है। यहां जगह-जगह झरने और नाले बहते दिखाई देते हैं।

नौ किलोमीटर पैदल रास्ता तय कर पहुंचते हैं मंदिर

हल्देश्वर महादेव मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब नौ किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करना पड़ता है, जो कई कठिनाइयों से भरा है। सिवाना के समीप पीपलून गांव की तलहटी से यह रास्ता शुरू होता है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच से गुजरने वाला पूरा मार्ग कच्चा और कई जगहों पर फिसलन भरा है। रास्ते में जगह-जगह पत्थरों पर तेंदुए सहित अन्य वन्यजीवों से सावधान रहने और रात में यात्रा न करने की चेतावनी लिखी हुई है।

मंदिर परिसर में रात को रुकने की भी अनुमति नहीं है। इसके बावजूद श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ अपनी यात्रा शुरू करते हैं। रास्ते में कई जगह छोटे नाले और झरने बहते हुए दिखाई देते हैं। करीब नौ किलोमीटर के इस दुर्गम मार्ग में श्रद्धालुओं को कई पहाड़ियां पार करनी पड़ती हैं। कठिन चढ़ाई और पथरीले रास्ते को पार करने के बाद एक पहाड़ी पर हल्देश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर दिखाई देता है।

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन होते हैं। मंदिर के पास ही एक पवित्र जलकुंड भी स्थित है। श्रद्धालु इसके जल को बहुत पवित्र मानते हैं और दर्शन के बाद इसे अपने साथ ले जाते हैं। पथरीले और दुर्गम क्षेत्र में भी चारों ओर फैली हरियाली को स्थानीय लोग भगवान शिव की कृपा मानते हैं।

मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब नौ किमी का पैदल रास्ता पार करना पड़ता है, जो पथरीला है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब नौ किमी का पैदल रास्ता पार करना पड़ता है, जो पथरीला है।

स्कंद पुराण में भी है मंदिर का जिक्र

यह मंदिर पौराणिक द्वापर युग से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसका उल्लेख ‘स्कंद पुराण’ में भी मिलता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने इस स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। बलराम जी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने यहां स्वयंभू ज्योतिर्लिंग प्रकट किया। बलराम जी का एक नाम ‘हलधर’ भी था, इसलिए उनके नाम पर इस स्थान को ‘हल्देश्वर महादेव’ कहा जाता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में यहां ‘हल्दिया’ नामक राक्षस का आतंक था। उसके अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए ग्रामीणों ने भगवान शिव की आराधना की। स्थानीय मान्यता है कि भगवान शिव का स्वयंभू स्वरूप एक विशाल वट वृक्ष के नीचे प्रकट हुआ था। आज भी यह स्थान श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

सावन के प्रत्येक सोमवार, महाशिवरात्रि और अन्य प्रमुख पर्वों पर हजारों श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक कर उनके दर्शन व पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग।

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग।

यहां दूसरे कई मंदिर भी हैं

हल्देश्वर महादेव मंदिर के पास ही गुरु गोरखनाथ की गुफा और धूणी भी स्थित है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने यहां अपना अज्ञातवास बिताया था।

यहां मुख्य मंदिर हल्देश्वर महादेव का है। इसके अलावा कोटेश्वर महादेव, सुखलेश्वर महादेव और पांडेश्वर महादेव के मंदिर भी स्थित हैं।

मंदिर के महंत संत भीमगिरीजी महाराज बताते हैं कि यहां पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। पहाड़ों के बीच यहां का प्राकृतिक वातावरण स्वयं महादेव की कृपा का प्रतीक है। वे पिछले 40 वर्षों से यहां तपस्यारत हैं। उनके शिष्य गणेशानंद गिरी महाराज भी उनके साथ रहकर मंदिर की सेवा में योगदान दे रहे हैं।

सावन के पूरे महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

सावन के पूरे महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

68 संतों की समाधियों का केंद्र

हल्देश्वर महादेव धाम संत परंपरा का भी एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। मंदिर परिसर में 68 संत-महात्माओं की समाधियां स्थित हैं। इनमें चार जीवित समाधियां विशेष श्रद्धा का केंद्र हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार, दयालगिरीजी महाराज की जीवित समाधि की विशेष मान्यता है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने और आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर परिसर के पास एक पवित्र जलकुंड भी स्थित है, जिसमें सालभर जल प्रवाहित होता रहता है।

हल्देश्वर महादेव धाम का वन क्षेत्र प्राकृतिक जैव-विविधता से भी भरा है। छप्पन की पहाड़ियों के घने जंगलों में तेंदुआ, लकड़बग्घा, सियार, जंगली सूअर, नीलगाय और खरगोश समेत अनेक प्रजातियों के वन्यजीव और पक्षी प्राकृतिक रूप से विचरण करते हैं।

मंदिर तक जाने वाले मार्ग में जगह-जगह वन्यजीवों का खतरा बना रहता है। इसको लेकर यहां चेतावनी भी लिखी है।

मंदिर तक जाने वाले मार्ग में जगह-जगह वन्यजीवों का खतरा बना रहता है। इसको लेकर यहां चेतावनी भी लिखी है।

बरसात के मौसम में कई बार मंदिर मार्ग पर श्रद्धालुओं को तेंदुए सहित अन्य वन्यजीव भी दिखाई दे जाते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह पूरा क्षेत्र वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। यही वजह है कि श्रद्धालु यहां समूह में यात्रा करते हैं और वन क्षेत्र से गुजरते समय विशेष सावधानी बरतते हैं।

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