कोटपूतली-बहरोड़, 1 घंटे पहले

किसान खेत में मेहनत करने के साथ फसलों से प्रोडक्ट तैयार करे तो मुनाफा चार से पांच गुना तक बढ़ा सकता है। इसकी मिसाल हैं 76 साल के किसान कैलाश चौधरी।

परपंरागत खेती के साथ आंवले के पौधे लगाए। आंवला बाजार में नहीं बिका तो लोगों के ताने सुनने पड़े। परिवार ने कहा-जमीन खराब कर दी। फिर आंवले की प्रोसेसिंग सीखी।
जापान की टेक्नोलॉजी से अचार, लड्डू, बर्फी और मुरब्बा बनाए। स्थानीय बाजार में प्रोडक्ट नहीं बिके, लेकिन एक अधिकारी की मदद से प्रोडक्ट बिके भी और मुनाफा भी हुआ।
आज आंवले की खेती ढाई बीघा से बढ़कर 12 बीघा तक पहुंच गई। सालाना टर्न ओवर डेढ़ करोड़ रुपए है। सरकारी वैज्ञानिक भी उनके यहां प्रयोग कर रहे हैं।
म्हारे देश की खेती में आज बात कोटपूतली के किसान कैलाश चौधरी की…

कैलाश चौधरी आसपास के एरिया के किसानों को भी खेती से होने वाले मुनाफे को बढ़ाने के अलग-अलग आइडिया भी शेयर करते रहते हैं।
10वीं पास, आर्मी में जाना चाहते थे
जिले के कीतरपुरा के रहने वाले कैलाश चौधरी ने 1968 में 10वीं पास की। चार भाइयों में वे सबसे बड़े हैं। आर्मी में जाना चाहते थे। पढ़ाई के साथ तैयारी भी की, लेकिन पिता देवकरण जाट और मां श्रवणी देवी ने नौकरी के लिए बाहर जाने से मना कर दिया।
कहा कि परिवार के पास 60 बीघा जमीन है, इसी पर खेती करो। कैलाश बताते हैं- उस समय परिवार के पास सिर्फ दो-तीन बीघा सिंचित जमीन थी। बारिश के समय चना, मूंग और मोठ की बुवाई करते थे।
कैलाश बताते हैं कि 1996 में खेती में कुछ नया करने की कोशिश में जयपुर के फाउंडेशन से ट्रेनिंग ली। वहां से पांच किलो केंचुए लाए और छप्पर बनाकर पांच वर्मी कम्पोस्ट बेड तैयार किए।
इससे रासायनिक खेती का नुकसान समझ आया। तभी से जैविक खाद और खेती के दूसरे तरीकों पर भी ध्यान देना शुरू किया।
कृषि विज्ञान केंद्र से मिले आंवले के 80 पौधे
कैलाश बताते हैं- 1998 में कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़ने के बाद खेत में लगाने के लिए फ्री में 80 आंवले के कलमी पौधे दिए। पहली बार आंवले का पौधा देखा था। इन्हें ढाई बीघा जमीन में लगाया।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की मदद से 20×20 फीट के गड्ढे करवाकर पौधे लगवाए। करीब चार साल बाद पेड़ों पर पहली बार फल आया। आंवला भी पहली बार देखा था।

आंवला को सुखाने के लिए सोलर ड्रायर बनाया। इसमें सूर्य की गर्मी से आंवले को सुखाया जाता है।
आंवला बाजार में नहीं बिका, भाइयों ने भी ताने दिए
कैलाश बताते हैं- 2003 में जब मेरे भाई आंवला बाजार में बेचने गए तो माल नहीं बिका। भाइयों ने कहा – यह क्या लगा दिया, कमाई तो हो नहीं रही है और पूरी जमीन खराब हो गई।
लोग भी हमें ताने मारने लगे थे। बंटवारे में भाइयों को 20 बीघा जमीन में से ढाई बीघा आंवले वाले बाग की मिली। उस समय सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि आंवले को कैसे बिके और इससे कमाई का रास्ता कैसे निकले।
वैज्ञानिकों की सलाह पर प्रोडक्ट बनाना सीखा
कैलाश बताते हैं- परेशान होकर कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचा। वैज्ञानिकों ने मुझे आंवले से प्रोडक्ट बनाने की सलाह दी। काम सीखने के लिए मुझे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ भेजा गया।
इसके बाद बर्तन और पैकिंग का सामान खरीदा। हमने आंवले से अचार, लड्डू, बर्फी और मुरब्बा बनाना शुरू किया। लेकिन शुरुआत में ये प्रोडक्ट भी कोटपूतली में नहीं बिके।
तब मुझे समझ आया कि सिर्फ प्रोडक्ट बनाना काफी नहीं है, उसे बेचने के लिए बाजार भी तैयार करना पड़ेगा।

प्रतापगढ़ में एक सप्ताह रुककर प्रोडेक्ट बनाने के लिए वहां से एक कारीगर को साथ लाए और अपने उत्पाद तैयार किए।
जयपुर में पहली बार डेढ़ क्विंटल माल बिका
किसान ने बताया कि प्रोडक्ट नहीं बिकने से परेशान होकर जयपुर के कृषि पंत भवन पहुंचा। वहां तत्कालीन प्रिंसिपल सेक्रेटरी राजीव महर्षि से मिला और अपनी समस्या बताई कि प्रोडक्ट बना लिए हैं, लेकिन बेच नहीं पा रहा हूं।
उन्होंने ने मेरी मदद की। ग्राउंड फ्लोर पर टेबल लगवाकर मेरे प्रोडक्ट रखवा दिए। वहां मेरा पहला डेढ़ क्विंटल माल बिक गया। इसमें लड्डू और बर्फी की बिक्री ज्यादा हुई। इसके बाद मैंने इन्हीं दोनों प्रोडक्ट पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया।
पहली बिक्री के बाद वैन खरीदी, प्रोसेसिंग यूनिट तैयार की
पहली बिक्री से हौसला बढ़ा तो ट्रांसपोर्ट के लिए वैन खरीदी। तत्कालीन प्रिंसिपल सेक्रेटरी की सलाह से 500 स्क्वायर मीटर जमीन कन्वर्ट करवाकर प्रोसेसिंग सेटअप तैयार किया। प्रोडक्ट के लिए लाइसेंस लिया।
इसके बाद 25 अक्टूबर 2004 को राजीव महर्षि खुद कैलाश चौधरी की यूनिट के उद्घाटन के लिए पहुंचे। वे अपने साथ अधिकारी और मीडिया को भी लेकर आए थे। इससे मेरे काम को पहचान मिली और आगे बढ़ने का रास्ता खुला।
बिना खर्च के लिए प्रोडक्ट सुखाने का सेटअप
किसान कैलाश बताते हैं- आंवला सुखाने में परेशानी आती थी। मुझे पॉली टनल ड्रायर के बारे में पता चला। इसमें जापान की तकनीक का इस्तेमाल किया गया था।
मैंने इसकी जानकारी जुटाई और उदयपुर जाकर ड्रायर देखा। महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से मेरे यहां डमी ड्रायर लगाया गया। इसमें मेरी कोई कॉस्ट नहीं आई। इसके बाद टनल बनाकर दे दी गई। मेरी रनिंग कॉस्ट जीरो है।

चंडीगढ़ ट्रेड फेयर में डेढ़ लाख की बिक्री हुई
किसान बताते हैं- कृषि विभाग के अधिकारियों की मदद से 2005 में चंडीगढ़ के इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में अपने प्रोडक्ट लेकर गया। डेढ़ लाख रुपए की बिक्री हुई। बेस्ट फार्मर का अवॉर्ड भी मिला।
दिल्ली के पूसा में हॉर्टिकल्चर एक्सपो में राजस्थान की ओर से अपने प्रोडक्ट लेकर गए। वैल्यू एडिशन प्रोडक्ट की खूब तारीफ हुई।
मैंने खादी कमीशन में स्टॉल लगाना शुरू किया। इसके बाद पैकिंग और मार्केटिंग पर काम किया। अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाने से वहीं से डिस्ट्रीब्यूटर भी बनने लगे।
आईसीआर के साथ पांच साल का एग्रीमेंट हुआ
किसान कैलाश बताते हैं- इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICR) के साथ पांच साल का एग्रीमेंट हुआ। इसमें वैज्ञानिक मेरे फार्म पर ही प्रयोग करते थे।
उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। खेती और आंवले की प्रोसेसिंग में नए प्रयोग करने से मेरे काम को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली।

12 बीघा में आंवला, सालाना 100 टन उत्पादन
अभी मेरे पास 12 बीघा में आंवले का बाग है। सालाना करीब 100 टन आंवले का उत्पादन होता है। अक्टूबर से 15 मार्च तक आंवले की तुड़ाई चलती है। ग्रेडिंग के बाद फ्रेश आंवला बाजार में 20 रुपए किलो तक बिक जाता है।
आंवले का वैल्यू एडिशन करने से कमाई चार गुना तक हो जाती है। सालाना टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपए है। इसमें करीब 20 प्रतिशत मुनाफा होता है। अब हम अपने प्रोडक्ट ऑनलाइन भी बेच रहे हैं।
दोनों बेटों और बहू के साथ संभाल रहे बिजनेस
कैलाश चौधरी के बड़े बेटे मनीष कुमार (50) और उनकी पत्नी मीना कुमार (एमए), छोटे बेटे मुकेश कुमार (45) और उनकी पत्नी सुभिता चौधरी (होम साइंस से एमएससी) मिलकर बिजनेस संभाल रहे हैं। परिवार के सहयोग से आंवले की खेती, प्रोसेसिंग, पैकिंग और बाजार में प्रोडक्ट की बिक्री का काम आगे बढ़ रहा है।






