
’32 वोट साथ थे, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता ने नामांकन दाखिल करने से रोक दिया‘… राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) चुनाव के सियासी घटनाक्रम पर चूरू क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पराक्रम सिंह राठौड़ ने पहली बार खुलकर बात की।

उन्होंने बताया कि वे ढाई साल से जिस RCA अध्यक्ष चुनाव के लिए मेहनत कर रहे थे, उस सपने को पिता के कहने पर छोड़ दिया।
दैनिक भास्कर के साथ खास बातचीत में उन्होंने पिता के राजनीतिक भविष्य पर भी खुलकर बात की।
पार्टी में लंबे समय से पिता राजेंद्र राठौड़ की अनदेखी के सवाल पर उन्होंने कहा- CM ने पिता को 2 बार ‘कैबिनेट मंत्री’ स्तर के पद का ऑफर दिया था।
पढ़िए पूरा इंटरव्यू…
सवाल : राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन चुनाव में आखिर इतना विवाद क्यों हुआ? जवाब : फिलहाल राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव परिणाम पर रोक लग गई है। महिलाओं की क्रिकेट में भागीदारी का मैं भी समर्थन करता हूं। यही मुद्दा याचिका में उठाया गया था। अब हम लोग सोच रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में क्लेरिफिकेशन ऑफ ऑर्डर रिप्लाई करें। मेरा ऐसा मानना है कि न सिर्फ RCA बल्कि जिले में भी महिलाओं की भागीदारी बेहद जरूरी है।
सवाल : RCA अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का फैसला किसका था? जवाब : जिस दिन मैं चूरू जिला क्रिकेट संघ में आया था, उसी दिन मेरा मकसद RCA का अध्यक्ष बनना था। पिछले ढाई साल से मैं RCA के वोटर जिला संघ के सचिवों से लगातार संपर्क में था। हर सुख-दुख में उनके साथ खड़ा था। यही कारण था कि RCA के 38 वोटों में से 32 वोट मेरे और बृज किशोर उपाध्याय के समर्थन में थे।

पराक्रम सिंह राठौड़ ने दावा किया कि अगर वे चुनाव लड़ते तो 32 वोट उनको मिलते।
सवाल : चर्चा थी कि आपने जिला क्रिकेट संघ के वोटरों (सचिव) की बाड़ेबंदी कर रखी थी? जवाब : बाड़ेबंदी जैसी कोई बात नहीं थी। हालांकि, 32 में से 24 लोग जयपुर के दो अलग-अलग होटल में रुके हुए थे। हमने कोई बाउंसर नहीं लगा रखे थे। लगातार उनके फोन भी चल रहे थे। मुझे लगता है, प्रलोभन से कुछ नहीं होता है। प्रलोभन टेंपरेरी होता है। उन लोगों ने मेरे और बृजकिशोर जी के भाव देखे थे। इसी वजह से उनका हमारे प्रति समर्थन था।
सवाल : आखिर किसकी वजह से आपने नामांकन नहीं भरने का फैसला किया? जवाब : शुरुआत में हमें बताया गया था कि सरकार का राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में कोई दखल नहीं होगा। जिसके पास वोटर हैं वो आगे बढ़े। ऐसे में हमने जो 32 वोटर हमारे संपर्क में थे, उन्हें अपने साथ लिया।
हमने 23-24 तारीख तक नामांकन पत्र दाखिल करने का फैसला किया था। लेकिन भाजपा के सीनियर नेता अरुण चतुर्वेदी ने नॉमिनेशन फाइल करने से रोक दिया। बताया गया कि पार्टी और सरकार के स्तर पर यह फैसला हुआ कि कोई भी नेता पुत्र RCA का चुनाव नहीं लड़ेगा। मुझे जैसे ही यह आदेश मिला, मैंने उसे माना।
यह पूरी प्रक्रिया नॉमिनेशन फाइल करने से पहले ही हो गई थी। लेकिन आखिरी वक्त पर मुझे बृज किशोर ने अध्यक्ष पद पर नॉमिनेशन फाइल करने के लिए कहा था। वह चाहते थे कि बतौर डमी कैंडिडेट में नॉमिनेशन फाइल करूं। यह प्रक्रिया वैसे भी हर चुनाव में मुख्य कैंडिडेट के समर्थन में अपनाई जाती है। सिर्फ मैंने ही नहीं की और लोगों ने भी डमी फॉर्म भरे थे।

वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण चतुर्वेदी (मध्य में) के साथ पराक्रम सिंह राठौड़ (सबसे बाएं)।
सवाल : क्या सरकार के स्तर पर किसी से बात हुई? जवाब : मेरी सरकार के किसी व्यक्ति से कोई बात नहीं हुई। अरुण चतुर्वेदी ने भी नाम वापस लेने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने सिर्फ नॉमिनेशन फाइल करने से रोका था।
काफी बार मुझे और बृजकिशोर, दोनों को एडहॉक कमेटी का सदस्य बनने का ऑफर भी मिला था। लेकिन एडहॉक कमेटी में अलग-अलग विचारधारा के लोग आ गए थे। मैं किसी कंट्रोवर्सी का हिस्सा नहीं बनना चाहता था। यही कारण था कि लगभग ढाई साल तक मैं किसी भी एडहॉक कमेटी में भी नहीं आया।
सवाल : क्या आपने RCA अध्यक्ष बनने के सपने को सिर्फ पिता के कहने पर छोड़ दिया? जवाब : बिल्कुल, मैं इस धरती पर अगर सबसे ज्यादा किसी से अटैच हूं तो वह मेरे पिता हैं। मैं जब तक जिंदा हूं, तब तक उनका हर शब्द मेरे लिए आदेश है।

पराक्रम सिंह राठौड़ फिलहाल चूरू जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं।
सवाल : क्या आपके पिता को यह बुरा नहीं लगा कि आखिरी वक्त पर आपका नाम हटा दिया गया? जवाब : मैं और मेरे पिता बहुत अच्छे दोस्त हैं। हम दोनों में बहुत अच्छा खुला संवाद है। लेकिन वह ऐसा कभी नहीं चाहेंगे कि कोई बात उन्हें दुख पहुंचा रही है, तो उसका पता मुझे चले। मैं भी ऐसा नहीं चाहूंगा। वो मेरी आंखें पढ़कर जान लेते हैं और मैं भी उनकी आंखों से सब कुछ समझ जाता हूं।
सवाल : क्या आपके पिता ने आपको कोई और ऑप्शन दिया? जवाब : हम दोनों बाप-बेटे हैं, हम में सौदेबाजी नहीं होती। उन्होंने मुझे बोला कि हमें इसमें आगे नहीं बढ़ना है, उस वक्त मेरे लिए यह बात वहीं खत्म हो गई थी।
सवाल : नेता पुत्रों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर करने का फैसला क्या ठीक था? जवाब : मैं बड़ों के लिए फैसलों की समीक्षा करने लायक नहीं हूं। जो फैसला हमारे बड़ों ने लिया है, वह सोच-समझकर ही लिया होगा। वह लोग हमसे ज्यादा समझ रखते हैं।

धनंजय सिंह खींवसर के RCA अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा- जरूर कहीं गैप रहा होगा।
सवाल : धनंजय सिंह खींवसर, मोहित यादव और आशीष तिवाड़ी सरकार की फैसले के खिलाफ चुनावी मैदान में थे, आपको उनका यह फैसला ठीक लगता है? जवाब : चुनाव वाले दिन मेरी धनंजय सिंह खींवसर से बात हुई थी। तब उनका कहना था- हमें किसी ने चुनाव लड़ने से नहीं रोका है। लेकिन मुझे लगता है कहीं न कहीं कम्यूनिकेशन गैप रह गया होगा। क्योंकि धनंजय, मोहित, आशीष और मैं, कोई भी ऐसा नहीं हो जो पार्टी के आदेश को नहीं माने। मुझे लगता है- सही वक्त पर उन तक सही बात पहुंच नहीं पाई होगी।
फिर उन लोगों ने घोषणा कर दी चुनाव लड़ने की। उसके बाद नाम वापस लेना भी एक बड़ी समस्या बन जाता है। कई बार आपको न चाहते हुए भी अपना स्टैंड बरकरार रखना पड़ता है। मुझे लगता है कि जिस तरह मुझे वक्त रहते सूचना दी गई, अगर उन लोगों को भी यह सूचना दे दी जाती, तो वह लोग भी चुनाव नहीं लड़ते।
सवाल : आपको नहीं लगता आपके पिता राजेंद्र राठौड़ को लंबे समय से पार्टी में नजरअंदाज किया जा रहा है, फिर आपको भी चुनाव लड़ने से रोक दिया गया? जवाब : ऐसी बात नहीं है, कई बार ऐसा होता है कि पार्टी ने आपके लिए कुछ और सोच रखा होता है। लेकिन समय आने पर ही आपको उसके बारे में पता चलता है। निकाय परिसीमन से लेकर पंचायती राज परिसीमन तक मुख्यमंत्री जी ने मेरे पिता को दे रखा था। और भी कई जिम्मेदारियां भी दी जा रही हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने हमें बहुत कुछ दिया है। सात बार टिकट देकर मेरे पिता को विधायक बनाया है, उन्हें चार बार मंत्री, एक बार नेता प्रतिपक्ष और एक बार उप नेता प्रतिपक्ष बनाया। मुझे नहीं लगता हमें कुछ और मांगने की जरूरत है या फिर मन में कोई शिकायत है।
मुख्यमंत्री ने 2 से 3 बार मेरे पिता को कुछ और प्रस्ताव भी दिए हैं। उन्होंने मेरे पिता को बीसूका (बीस सूत्रीय कार्यक्रम) का उपाध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने की बात कही। जन अभाव अभियोग समिति का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भी मुख्यमंत्री ने ही दिया था। इसमें भी कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलता है। लेकिन मेरे पिता ने मुख्यमंत्री के कहने के बावजूद यह दोनों पद स्वीकार नहीं किए।

पिता राजेंद्र राठौड़ और माता के साथ पराक्रम सिंह राठौड़।
मुझे लगता है मेरे पिता एक अच्छे पार्लियामेंट्री हैं। उनका मन सदन में ही लगता है। वह सदन का ही हिस्सा बनना चाहते थे। विधानसभा का चुनाव हारने के बाद राज्यसभा चुनाव आए, तब चुन्नीलाल गरासिया और मदन राठौड़ को पार्टी ने मौका दिया। उस समय भी मेरे पिता का राज्यसभा जाने का मन था, लेकिन पार्टी का फैसला सर्वमान्य था।
इसके बाद लोकसभा चुनाव आए, तब मेरे पिता राजसमंद से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। राजसमंद लोकसभा क्षेत्र के सभी विधायकों ने भाजपा के सीनियर नेताओं को मेरे पिता को उम्मीदवार बनाने के लिए लिखकर भी दिया था। लेकिन पार्टी का निर्णय कुछ और था। पार्टी आगे तक सोच-विचार कर ही कोई फैसला करती है।
इसके बाद में राज्यसभा चुनाव हुए, तब भी मेरे पिता को मौका नहीं मिला। उन्हें बस इस बात का अफसोस है कि वह सदन का हिस्सा नहीं बन सके। लेकिन उन्हें भाजपा से कोई शिकायत नहीं है। पार्टी उन्हें लगातार काम दे रही है और वह पूरी निष्ठा के साथ उसे कर रहे हैं। मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जो काम उन्हें देते हैं।
सवाल : आप अपने पिता को कहां देखना चाहते हैं? जवाब : यह काफी मुश्किल सवाल है, इसका जवाब मुझसे बेहतर मेरे पिता ही दे सकते हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मेरे पिता सदन का हिस्सा रहना चाहते हैं।

सवाल : एक सवाल आपके भविष्य को लेकर, आप क्या करना चाहते हैं? जवाब : क्रिकेट में आकर मैं बेहतरीन काम करना चाहता था। ताकि अपने काम की छाप छोड़ खुद की पहचान बना सकूं। लेकिन मेरा असली मकसद मुख्यधारा की राजनीति में आने का है। मैं भाजपा के कार्यकर्ता के तौर पर काम करना चाहता हूं।





