जब इस्लामाबाद के आसमान में भारतीय जेट ने धमाके किए:ढाका, श्रीलंका से मालदीव तक; भारतीय वायुसेना की बहादुरी और सूझबूझ के किस्से

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कभी एक टूरिस्ट मैप के भरोसे ढाका के गवर्नर हाउस पर 128 रॉकेट दागे, जिसने 1971 की जंग में पाकिस्तान को सरेंडर करवा दिया। कभी एक कॉल पर 2500 किमी दूर जाकर मालदीव में तख्तापलट का तख्तापलट कर दिया। श्रीलंका में घुसकर सेना से घिरे लाखों तमिलों को आसमान से खाना-पानी, कपड़े और दवाएं पहुंचाए।

इन ऑपरेशन्स को अंजाम देने वाली भारतीय वायुसेना आज 94 साल की हो गई। वायुसेना दिवस पर IAF की बहादुरी और सूझबूझ के 4 रोमांचक किस्से…

14 दिसंबर 1971 की बात है। भारत और पाकिस्तान के बीच जंग को 10 दिन बीत चुके थे। भारतीय सेना ढाका की तरफ बढ़ रही थी। थलसेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ ने पाकिस्तानी सेना को हथियार डालने का प्रस्ताव दिया, लेकिन जवाब नहीं आया।

इसी बीच सुबह-सुबह ढाका के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल के टेलीफोन की घंटी बजी। पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर डॉ. एएम मलिक ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि जॉन केली को दोपहर 12 बजे गवर्नर हाउस में होने वाली कैबिनेट मीटिंग का न्योता दिया।

भारतीय सेना ने इस कॉल को इंटरसेप्ट कर लिया। पता चला कि इस बैठक में पूर्वी पाकिस्तान के मार्शल लॉ प्रशासक और वायुसेना के प्रमुख भी होंगे। इस बैठक में खलल डालकर पाकिस्तान पर सरेंडर का दबाव बनाया जा सकता था। आनन-फानन में प्लान तैयार हुआ।

बैठक से करीब एक घंटे पहले भारतीय वायुसेना के गुवाहाटी और हाशिमारा बेस को हमले का आदेश मिला। मिशन था- 11:50 बजे ढाका के आसमान में पहुंचना है और मीटिंग वाली जगह पर ऐसे हमले करना कि किसी को नुकसान न पहुंचे। हालांकि जल्दबाजी में टारगेट गवर्नर हाउस की जगह सर्किट हाउस बता दिया गया।

गुवाहाटी की 28 स्क्वाड्रन ‘फर्स्ट सुपरसोनिक्स’ के 4 MiG-21 विमान और हाशिमारा की 37 स्क्वाड्रन ‘ब्लैक पैंथर्स’ के 2 हंटर जेट्स रनवे पर तैनात हो गए। गुवाहाटी वाली टुकड़ी की कमान विंग कमांडर बीके बिश्नोई ने संभाली और हाशिमारा में ये जिम्मा मिला विंग कमांडर आरवी सिंह को।

उस वक्त विंगमैन रहे हरीश मसंद के मुताबिक, हमें बर्मा शेल कंपनी के ढाका के टूरिस्ट मैप दिए गए। हमने इन्हें अपनी साइड पॉकेट में खोंस लिया।

दोनों बेस से ढाका की उड़ान महज 20 मिनट की थी। सुबह 11:26 बजे जेट्स रनवे पर उड़ान के लिए तैयार थे। जैसे ही इंजन चालू हुए, कॉकपिट में बैठे विंग कमांडर बिश्नोई को रनवे पर एक जवान हाथ में एक कागज लहराते हुए दिखा। उसने बताया कि बैठक सर्किट हाउस में नहीं, गवर्नर हाउस में होगी।

विंग कमांडर बिश्नोई बताते हैं कि हमारे पास इतना भी वक्त नहीं बचा था कि नक्शे पर नए टारगेट को देख सकें।

सुबह 11:55 बजे सभी विमान ढाका के आसमान में पहुंच चुके थे। एक बड़ी सरकारी इमारत के बाहर खड़ी लिमोजीन गाड़ियों से कन्फर्म हुआ कि यही गवर्नर हाउस है। भीतर मीटिंग चल भी रही थी।

इमारत के ऊपर बड़ा-सा गुंबद था। विंग कमांडर बिश्नोई ने सीधे गुंबद को निशाना बनाया। कुल 128 रॉकेट दागे गए। पीछे से आ रहे हंटरों ने गन फायरिंग की। पूरा इलाका धूल-धुएं से भर गया, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुंचा। गवर्नर मलिक, यूएन प्रतिनिधि केली समेत तमाम लोग जान बचाकर भागने लगे।

भारतीय वायुसेना ने गवर्नर हाउस पर ऐसे रॉकेट दागे कि छतों और गुंबद पर बड़े-बड़े छेद हो गए।

भारतीय वायुसेना ने गवर्नर हाउस पर ऐसे रॉकेट दागे कि छतों और गुंबद पर बड़े-बड़े छेद हो गए।

बांग्लादेश में भारत के पहले डिप्टी हाई कमिश्नर रहे जेएन दीक्षित अपनी किताब ‘इंडिया-पाकिस्तान इन वार एंड पीस’ में लिखते हैं, ‘रॉकेटों ने मीटिंग वाले कमरे और उसकी मेज को भारी नुकसान पहुंचाया। इस हमले ने पूर्वी पाकिस्तानी हुक्मरानों को हिला दिया और सरेंडर करने के लिए मजबूर किया।’

इस हमले से मलिक इतना डर गए कि उन्होंने फौरन कागज के टुकड़े पर कांपते हाथों से इस्तीफा लिख दिया। इसी के साथ पूर्वी पाकिस्तान की नागरिक सरकार खत्म हो गई। मलिक और उनके मंत्रिमंडल ने इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले शरण ली।

इस हमले के 2 दिन बाद 16 दिसंबर को पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारतीय कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने अपने 90 हजार सैनिकों के साथ सरेंडर कर दिया। इसी के साथ पाकिस्तान से टूटकर नया देश बना- बांग्लादेश। जिस गवर्नर हाउस पर भारतीय वायुसेना ने रॉकेट गिराए थे, वो आज बंगभवन है, यानी बांग्लादेश के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास।

1987 की बात है। श्रीलंका का उग्रवादी गुट ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ यानी लिट्टे अलग तमिल देश की मांग के लिए हथियारबंद आंदोलन चला रहा था। श्रीलंका का जाफना प्रायद्वीप लिट्टे के कंट्रोल में था।

श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के खिलाफ ‘ऑपरेशन लिबरेशन’ लॉन्च करके जाफना को घेर लिया। खाना, दवा और ईंधन की सप्लाई ठप पड़ गई। भारत में इसको लेकर गुस्सा था। राजीव गांधी की सरकार ने श्रीलंका से हमले रोकने को कहा, लेकिन बात नहीं बनी।

2 जून 1987 को भारत ने ऐलान किया कि वह जाफना के लिए राहत सामग्री भेजेगा। एक तटरक्षक पोत के साथ मछली पकड़ने वाली 19 नावें जाफना की ओर बढ़ीं। उन पर 38 टन खाना, ईंधन और दवाइयां लदी थीं, लेकिन श्रीलंकाई नौसेना ने कच्चाथीवू के पास इन्हें रोक लिया। 4 घंटे तक टकराव चला और भारतीय जत्थे को लौटना पड़ा।

भारत ने इसे अपमान माना और तय किया कि अब हवा से मदद पहुंचाई जाएगी। भारतीय वायुसेना ने डिप्टी एयर चीफ मार्शल एस. राघवेंद्रन की निगरानी में ‘ऑपरेशन पूमलाई’ लॉन्च किया गया। तमिल भाषा में पूमलाई का मतलब है- ‘फूलों की माला’। इसे ‘ईगल मिशन 4’ भी कहा गया।

मिशन के लिए ग्वालियर बेस से कुछ मिराज-2000H जेट्स और आगरा से 5 AN-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट बेंगलुरु पहुंचे। 4 जून की दोपहर 3 बजे नई दिल्ली में श्रीलंकाई उच्चायुक्त बर्नार्ड तिलकरत्ना को तलब करके बता दिया कि भारतीय वायुसेना एक घंटे बाद राहत सामग्री लेकर जाफना के लिए उड़ान भरेगी। अगर कोई रुकावट पैदा की गई, तो उनके साथ उड़ रहे मिराज-2000H एक्शन लेंगे।

हर मिराज-2000H के साथ हवा से हवा में मार करने वाली मैट्रा मैजिक II मिसाइलें, 250 राउंड गोले और अतिरिक्त फ्यूल के लिए 3 ड्रॉप टैंक लगाए गए। वहीं AN-32 पर चावल, दूध पाउडर, सब्जियां, मिट्टी का तेल, दवाइयां जैसी करीब 25 टन राहत सामग्री लादी गई। हर बॉक्स पर पैराशूट लगाया गया।

AN-32 विमानों ने शाम 3:55 बजे बेंगलुरु से उड़ान भरी। मिराज-2000H ने उन्हें एस्कॉर्ट किया। AN-32 दस्ते को ग्रुप कैप्टन बीके सुंदर और मिराज-2000H को विंग कमांडर अजीत भावनानी लीड कर रहे थे। विमानों पर 35 देसी-विदेशी पत्रकार भी सवार थे।

बेंगलुरू के एयरपोर्ट से ऑपरेशन पूमलाई के लिए उड़ान भरता An-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट।

बेंगलुरू के एयरपोर्ट से ऑपरेशन पूमलाई के लिए उड़ान भरता An-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट।

शाम 4:47 बजे ग्रुप कैप्टन सुंदर ने कोलंबो ATC से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। करीब 5 बजे जाफना शहर के पास वे पहुंचे। 12 हजार फीट पर उड़ रहे विमान 1500 फीट पर आए और शहर से 7 किमी दूर तय इलाके में राहत सामग्री गिराई। मिशन पूरा करके शाम 6:13 बजे विमान बेंगलुरू पहुंच गए।

इसको लेकर श्रीलंका ने भारत पर संप्रभुता के उल्लंघन का आरोप लगाया, जबकि भारत ने इसे मानवीय मदद बताया। इसके बाद ही श्रीलंकाई राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने ने राजीव गांधी सरकार से बातचीत की पेशकश की। जाफना की घेराबंदी जल्द ढीली पड़ने लगी।

29 जुलाई 1987 को भारत-श्रीलंका समझौते पर दस्तखत हुए, जिसके बाद भारतीय शांति सेना श्रीलंका पहुंची। लेकिन इससे लिट्टे इतना नाराज हुआ कि उसने 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी।

करीब 1200 छोटे-बड़े द्वीपों से मिलकर बना है- मालदीव। राजधानी माले इतनी छोटी है कि एक छोर से दूसरे छोर तक पैदल जा सकते हैं। राजधानी का हवाई अड्डा माले में नहीं, बल्कि पास के हुलहुले द्वीप पर है। वहां तक नाव से जाना पड़ता है।

किस्सा 1988 का है। राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम की सरकार थी। अब्दुल्ला लुथुफी नाम का कारोबारी उनका तख्तापलट करना चाहता था। उसके साथ श्रीलंका के तमिल अलगाववादी संगठन PLOTE के हथियारबंद लड़ाके थे।

3 नवंबर को तड़के साढ़े 3 बजे हमलावर माले पहुंचे। उन्होंने रेडियो और टीवी स्टेशन कब्जाए। नेशनल सिक्योरिटी सर्विस हेडक्वार्टर पर हमला किया। राष्ट्रपति भवन को घेरा। कई मंत्रियों को बंधक बनाया। गयूम जान बचाकर छिपने लगे।

सुबह होते-होते गयूम ने भारत, श्रीलंका, सिंगापुर, पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को फोन करके मदद मांगी। पाकिस्तान और श्रीलंका ने मना कर दिया। अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर ने ज्यादा वक्त लगने की बात कही।

भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भी मानना था कि ये पड़ोसी की मदद से ज्यादा भारत के आंगन में किसी बाहरी ताकत के घुसने का सवाल था। उन्होंने तीनों सेनाओं का ‘ऑपरेशन कैक्टस’ लॉन्च किया।

सुबह 7 बजे भारतीय वायुसेना को मिशन की जानकारी मिली। आगरा एयरबेस पर 44 स्क्वाड्रन ‘माइटी जेट्स’ के 3 इल्यूशिन IL-76 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट तैयार किए जाने लगे। कमान संभाली ग्रुप कैप्टन अनंत गोपाल बेवूर ने। वहीं सेना की 50वीं इंडिपेंडेंट पैराशूट ब्रिगेड को 10 बजे अलर्ट किया गया। 6 पैरा बटालियन को मेन स्ट्राइक फोर्स बनाया गया।

पहले तय किया गया कि जवानों को एयरड्रॉप किया जाएगा, यानी जवान विमान से कूद कर पैराशूट के सहारे उतरेंगे। लेकिन उतरने के लिए जमीन इतनी कम थी कि करीब 60% जवानों को पानी में उतरना पड़ता। ऐसे में हुलहुले एयरपोर्ट पर विमानों को लैंड कराकर फोर्स भेजने की तैयारी की गई।

2 एयरक्राफ्ट में पैराट्रूपर्स, गोला-बारूद और भारतीय हाई कमिश्नर अरुण बनर्जी सवार हुए। शाम 6 बजे विमानों ने उड़ान भरी। 6 मिराज-2000H इन्हें एस्कॉर्ट किया।

2500 किमी से ज्यादा की दूरी और करीब 4 घंटे की उड़ान के बाद ये हुलहुले रनवे के पास पहुंचे। हुलहुले का रनवे IL-76 जैसे विमान की लैंडिंग के लिए थोड़ा छोटा था।

ग्रुप कैप्टन अनंत गोपाल बेवूर ने हुलहुले ATC से ‘हादिया’ कोडवर्ड कहकर संपर्क किया। महज 10 सेकंड के लिए रनवे की लाइटें जलाई गईं और विमान लैंड हुए। रात 9:48 पर पहला और 10 मिनट बाद दूसरा IL-76 लैंड हुआ।

जवानों ने फुर्ती के साथ 40-45 मिनट में पूरा एयरपोर्ट कंट्रोल में ले लिया। फिर 7 स्पीड बोट पर सवार होकर माले पहुंचे और हथियारबंद लड़ाकों से भिड़े। रात 2 बजे तक गयूम को उनके ठिकाने से निकाल लिया गया। सुबह साढ़े 4 बजे उनकी और पीएम राजीव गांधी की बात हुई। दोपहर 11 बजे तक पूरे माले पर भारतीय जवानों का कंट्रोल था और इलाके को सुरक्षित घोषित कर दिया। 16 घंटे के ऑपरेशन में भारत ने मालदीव में तख्तापलट की कोशिश नाकाम कर दी।

हुलहुले एयरपोर्ट पर मौजूद भारतीय वायुसेना और सेना के जवान।

हुलहुले एयरपोर्ट पर मौजूद भारतीय वायुसेना और सेना के जवान।

इस बीच जब हमलावर बंधकों को साथ लेकर मालवाहक जहाज ‘एमवी प्रोग्रेस लाइट’ पर सवार होकर श्रीलंका की ओर जाने लगे, तो भारतीय नौसेना के फ्रिगेट INS गोदावरी और INS बेतवा ने उन्हें घेर लिया। रॉकेट दागे और 68 बंधकों को छुड़ा लिया। वहीं 4 नवंबर की सुबह 44 स्क्वाड्रन ने 3 और उड़ानें भरीं और जवानों की दूसरी खेप भेजी।

हालात ठीक होते ही सैनिकों को वापस बुला लिया गया। तब अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता में अहम योगदान बताया। वहीं ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने कहा, ‘थैंक गॉड फॉर इंडिया’।

साल 1997, मई का महीना। ‘द हिंदू’ के डिप्लोमेटिक कॉरेस्पोंडेंट अमित बरुआ की इस्लामाबाद में नई-नई पोस्टिंग हुई थी। 27 मई की सुबह इस्लामाबाद के आसमान में अचानक ‘बूम’ की आवाज गूंजी। अमित बरुआ अपनी किताब ‘डेटलाइन इस्लामाबाद’ में लिखते हैं कि धमाकों की आवाज सुनकर वे घर से बाहर भागे।

अमित ने पुलिस और एंबुलेंस यूनिट को फोन घुमाए कि आखिर हुआ क्या है, लेकिन कुछ कन्फर्म नहीं हुआ।

शाम होते-होते पाकिस्तानी एयरफोर्स ने एलान किया कि भारतीय वायुसेना के एक MiG-25R टोही विमान ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है। इसी वजह से इस्लामाबाद के ऊपर कई सोनिक बूम हुए। सोनिक बूम, यानी जब कोई विमान हवा में आवाज की रफ्तार से तेज चलता है, तो उससे बनने वाली शॉकवेव या गरज।

अमित बरुआ को पाकिस्तानी अफसरों ने बताया कि यह भारतीय जेट करीब 60 हजार फीट पर था। F-16 समेत पाकिस्तान वायुसेना का कोई भी विमान वहां तक पहुंच ही नहीं सकता था।

पाकिस्तान की स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट डॉ. समीना अहमद के मुताबिक, उस भारतीय जेट को कोई पाकिस्तानी एयरफोर्स इंटरसेप्ट नहीं कर सकी। हालांकि भारतीय वायुसेना ने कभी इस उड़ान के बारे में कुछ नहीं कहा।

कहा जाता है कि ये टोही विमान इस्लामाबाद और उसके आस-पास की स्ट्रैटजिक जगहों की तस्वीरें लेने आया था। अमित लिखते हैं, ‘मुझे बताया गया कि भारत ने ऐसा पाकिस्तान को परेशान करने के लिए किया था।’

दरअसल, उस वक्त दुनिया को पता ही नहीं था कि भारतीय वायुसेना के पास सोवियत का बनाया मिखोयान-गुरेविच MiG-25 जेट है। इस्लामाबाद में हुए सोनिक बूम से करीब 16 साल पहले 17 अगस्त 1981 को भारत ने इसका टोही वर्जन लिया था। इन्हें 102 स्क्वाड्रन ‘ट्राइसोनिक्स’ ऑपरेट करती थी, जिसका ठिकाना बरेली था। स्क्वाड्रन में 8 सिंगल-सीट वाले MiG-25R और 2 डबल-सीट वाले ट्रेनिंग जेट थे।

बरेली एयर स्पेसस्टेशन के रनवे पर खड़ा भारतीय वायुसेना का MiG-25R जेट।

बरेली एयर स्पेसस्टेशन के रनवे पर खड़ा भारतीय वायुसेना का MiG-25R जेट।

भारत MiG-25 को गरुड़ और NATO फॉक्सबैट कहता था। सोवियत ने ऊंचे और तेज अमेरिकी बॉम्बर्स और जासूसी विमानों के जवाब के तौर पर इसे बनाया था। इसे उड़ाने वाले रिटायर्ड एयर मार्शल सुमित मुखर्जी के मुताबिक, इसमें कलाबाजियां नहीं हो सकती थीं, लेकिन ऊंचाई और रफ्तार में इसका कोई जोड़ नहीं था।

MiG-25 आमतौर पर 65 हजार से 85 हजार फीट के बीच उड़ता था। 90 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकता था। ये आवाज से करीब 3 गुना तेज रफ्तार से उड़ सकता था। एक लंबी उड़ान में करीब 23 हजार लीटर फ्यूल खर्च करता था।

MiG-25 में 1200 एमएम के बड़े कैमरे लगे होते थे। ये इतने ताकतवर होते थे कि बरेली से नई दिल्ली की तस्वीरें खींच सकते थे। इसे उड़ा चुके रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन आलोक चौहान के मुताबिक, पाकिस्तान जितने बड़े देश का नक्शा यह जेट कुछ ही उड़ानों में बना सकता था।

2006 में भारत का MiG-25 बेड़ा रिटायर हो गया।

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