रैपिडो पर ₹10 लाख का जुर्माना:जबरन एक्स्ट्रा पैसे और टिप वसूलने का आरोप, किराया न बढ़ाने पर राइड न मिलने का डर दिखाती

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कंज्यूमर अथॉरिटी CCPA ने राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म रैपिडो की मूल कंपनी पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। अथॉरिटी ने देश भर के कैब और बाइक-टैक्सी सेक्टर की जांच की थी। इस दौरान पाया गया कि रैपिडो एप राइड बुकिंग के समय गलत तरीके अपना रहा था।

कंपनी ग्राहकों से प्री-राइड टिपिंग यानी राइड शुरू होने से पहले टिप मांग रही थी। इसके अलावा डायनामिक प्राइसिंग से जुड़ी गड़बड़ियां भी मिलीं। कंपनी एप के डिजाइन से ऐसा माहौल बनाती थी, जिससे ग्राहक पर ज्यादा पैसे देने का दबाव बनता था।

सवाल जवाब में पूरा मामला समझें…

सवाल 1: बुकिंग के समय ऐप पर ग्राहकों को किस तरह के मैसेज दिखाकर भटकाया जाता था?

जवाब: ग्राहक जब एप पर राइड बुक करता था, तो एप पहले एक तय किराया दिखाता था। बुकिंग प्रोसेस शुरू होते ही अलग-अलग मैसेज आने लगते थे। एप पर लिखा आता था-जितना ज्यादा किराया देंगे, राइड मिलने का चांस उतना ज्यादा होगा। इसके अलावा एप पर एक और मैसेज दिखता था- ड्राइवर 60 रुपए में राइड स्वीकार नहीं कर रहे हैं, 10, 20 या 30 रुपए बढ़ाकर देखें।

सवाल 2: रैपिडो के इस एल्गोरिदम से ग्राहकों पर क्या असर पड़ता था?

जवाब: रैपिडो के इस एल्गोरिदम से ग्राहक के मन में गलतफहमी पैदा होती थी। उसे लगता था कि ज्यादा पैसे दिए बिना जल्दी गाड़ी नहीं मिलेगी। बुकिंग के वक्त ग्राहक जल्दी में होता है। वह एप की सर्विस पर निर्भर होता है। इसलिए राइड छूटने के डर से वह मजबूरन ज्यादा पैसे दे देता था।

सवाल 3: अथॉरिटी ने इसे ‘कन्फर्म शेमिंग’ और ‘डार्क पैटर्न’ क्यों कहा?

जवाब: सरकार ने ‘डार्क पैटर्न गाइडलाइंस, 2023’ बनाई है। इस तरह के व्यवहार को इन नियमों के तहत ‘कन्फर्म शेमिंग’ माना गया है। ग्राहक जब बुकिंग के आखिरी स्टेप पर पहुंच जाता है तब एक्स्ट्रा पैसे मांगना उस पर दिमागी दबाव डालता है। पैसे न बढ़ाने पर राइड न मिलने का डर दिखाया जाता है। इस वजह से ग्राहक ज्यादा पैसे देने पर मजबूर हो जाता है।

सवाल 4: रैपिडो के ‘सेट योर प्राइस’ स्लाइडर फीचर में क्या गड़बड़ी पकड़ी गई?

जवाब: CCPA ने ‘सेट योर प्राइस’ वाले स्लाइडर फीचर की भी जांच की। इसमें पाया गया कि स्लाइडर का डिजाइन ग्राहकों को गुमराह करने के लिए बनाया गया था:

  • ग्राहक जब किराया बढ़ाता था, तो हरे रंग में मैसेज आता था- ‘हायर चांस ऑफ गेटिंग ए राइड’।
  • ग्राहक जब किराया कम करता था, तो लाल या ऑरेंज रंग में वॉर्निंग दिखाई जाती थी।
  • स्लाइडर में पैसे बढ़ाने के लिए ज्यादा स्पेस था। किराया कम करने का ऑप्शन छोटा था।

सवाल 5: राइड शुरू होने से पहले टिप मांगने पर CCPA ने क्या आपत्ति जताई?

जवाब: CCPA के मुताबिक शुरुआती किराए में ही दूरी, समय, ट्रैफिक और टोल का खर्च जुड़ा होता है। इसमें ड्राइवर की कमाई का हिस्सा भी शामिल रहता है। इसलिए सर्विस शुरू होने से पहले टिप मांगने का कोई तुक नहीं बनता है।

टिप हमेशा सर्विस पूरी होने के बाद ग्राहक अपनी मर्जी से देता है। इसे राइड पाने की शर्त नहीं बनाया जा सकता है। ‘मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस, 2025’ में भी नियम साफ हैं। टिप का ऑप्शन सिर्फ राइड खत्म होने के बाद मिलना चाहिए, बुकिंग के दौरान नहीं।

सवाल 6: अपनी सफाई में रैपिडो ने क्या तर्क दिए?

जवाब: रैपिडो ने केंद्रीय अथॉरिटी के सामने अपनी सफाई में तीन मुख्य बातें कहीं:

  • एप पर टिप देना पूरी तरह से ग्राहक की मर्जी पर निर्भर है।
  • ग्राहक एक्स्ट्रा पैसे दे या न दे, एप का मैचिंग एल्गोरिदम एक समान काम करता है।
  • एप के ये मैसेज बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे आम जिंदगी में सवारी और ड्राइवर के बीच मोलभाव होता है।

सवाल 7: CCPA ने रैपिडो की सफाई को क्यों खारिज कर दिया?

जवाब: CCPA ने रैपिडो के सभी तर्कों को नकार दिया। अथॉरिटी ने कहा कि एप के मैसेज और डिजाइन की टाइमिंग गलत है। यह ग्राहक पर उस वक्त दबाव बनाता है जब वह गाड़ी पाने के लिए एप पर निर्भर होता है। इसके अलावा कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि ज्यादा पैसे देने से सचमुच राइड मिलने का चांस बढ़ता है। इसलिए इस दावे को पूरी तरह से बेबुनियाद और भ्रामक पाया गया।

सवाल 8: क्या दूसरी कैब-बाइक कंपनियों पर भी ऐसी कोई कार्रवाई चल रही है?

जवाब: हां, यह कार्रवाई भारतीय कैब और बाइक एग्रीगेटर कंपनियों की बड़ी जांच का हिस्सा है। CCPA की चीफ कमिश्नर निधि खरे और कमिश्नर अनुपम मिश्रा इस जांच की अगुवाई कर रहे हैं।

अथॉरिटी ने ऊबर, ओला, रैपिडो और नम्मा यात्री जैसी कंपनियों को नोटिस जारी किए हैं। सभी को ‘डार्क पैटर्न गाइडलाइंस 2023’ का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। कंपनियों से सेल्फ-डिक्लेरेशन मांगा गया है। फिलहाल ऊबर और ओला के खिलाफ जांच जारी है।

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