
कोटा नगर निगम में 100, अजमेर–बीकानेर में 80-80 और भीलवाड़ा में 70 वार्ड हैं। अभी तक के समीकरणों में चारों निगम में भाजपा मजबूत दिख रही है, हालांकि मुकाबला एकतरफा भी नहीं है।
कोटा में भाजपा से ओम बिरला,हीरालाल नागर, मदन दिलावर और कांग्रेस से पूर्व मंत्री शांति धारीवाल, प्रहलाद गुंजल की प्रतिष्ठा दांव पर है।
अजमेर में वासुदेव देवनानी के पूर्व में बड़े समर्थक माने जाने वाले दो बार अजमेर के मेयर रहे धर्मेंद्र गहलोत ने उनके वार्ड से अपनी पत्नी को निर्दलीय खड़ा कर सीधी चुनौती दे डाली है।
भीलवाड़ा में अपने-अपने समर्थकों को टिकट नहीं दिलवा पाने के आपसी विवाद के चलते पूर्व मंत्री रामलाल जाट व नेता धीरज गुर्जर ने चुनावी मैदान से ही दूरी बना ली है।
वहीं सिंबल नहीं दे पाने के कारण 17 वार्डों में कांग्रेस का कोई अधिकृत उम्मीदवार खड़ा नहीं हो पाया है। बीकानेर में केंद्रीय केबिनेट मंत्री अर्जुनराम मेघवाल की प्रतिष्ठा दांव पर है। यहां पूर्व मंत्री डॉ.बी.डी. कल्ला ने कांग्रेस की चुनावी कमान संभाल रखी है।

कोटा
मुकाबला ओम बिरला-शांति धारीवाल के बीच, गुंजल भी लाइमलाइट में
पार्षदों के बजाय इस चुनाव को ओम बिरला, शांति धारीवाल, प्रहलाद गुंजल के बीच सीधी टक्कर के रूप में देखा जा रहा है। ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर भी ताकत लगा रहे हैं।
बीजेपी में जिले से मंत्री और बीजेपी विधायकों ने भी बिरला से चर्चा के बाद ही अपने पसंदीदा को टिकट दिलवाने की पैरवी की। इधर, कांग्रेस में धारीवाल ने जिम्मा अपने कंधे पर ले रखा है।
गुर्जर नेता प्रहलाद गुंजल और उनके कार्यकर्ताओं की OBC वोट बैंक पर अच्छी पकड़ दिख रही है। हाल ही में प्रियंका गांधी ने भी उनसे दिल्ली में मुलाकात की।
कोटा में एक निगम पर चुनाव होने से कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ेंगी, क्योंकि शहरी वोटर बीजेपी का माना जाता है। पिछली बार दो निगम थे। कांग्रेस सत्ता में थी और परिसीमन में वार्डों की सीमा तय करने में पक्षपात के आरोप लगे थे।

भाजपा और कांग्रेस दोनों के बड़े चेहरों के लिए कोटा सीट प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है।
जातिगत प्रभाव : कोटा नगर निगम के चुनाव में ओबीसी वर्ग 21% वार्डों में सीधा प्रभाव डालता है। इसमें जाट, माली, गुर्जर, धाकड़, कुमावत जैसी जातियां आती हैं। निगम चुनाव के लिहाज से देखें दोनों ही पार्टियों को इन जातियों से लगभग बराबर सपोर्ट मिलता है।


निगम के 3 सबसे बड़े मुद्दे
- सरकारी तंत्र/प्रशासनिक मशीनरी का कथित दुरुपयोग
- बाहरी इलाके में पेयजल सप्लाई, टूटी सड़कें
- भीतरी वार्डों में नालियों की सफाई, कचरा प्रबंधन



अजमेर
देवनानी और पूर्व मेयर गहलोत की अनबन आई सामने
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और दो बार बीजेपी से मेयर रहे धर्मेंद्र गहलोत के बीच कई महीनों से चल रही अनबन निकाय चुनाव से पहले खुलकर सब के सामने आ गई।
देवनानी के वार्ड 4 से धर्मेंद्र गहलोत ने अपनी पत्नी हेमा गहलोत को निर्दलीय खड़ा कर के बीजेपी को सीधी चुनौती दे दी है। गहलोत इस वार्ड में रहते भी नहीं है और कांग्रेस ने भी यहां से कोई प्रत्याशी नहीं बनाया है।
समर्थकों का आरोप है कि वासुदेव देवनानी ने गहलोत की पत्नी को बीजेपी से टिकट नहीं लेने दिया। टिकट देवनानी की समर्थक मोनिका जैन को मिला है।
हालांकि, मोनिका जैन भी उस वार्ड की नहीं है और पिछला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था। उनको भाजपा के जिलाध्यक्ष रमेश सोनी ने हराया था।
गहलोत ने पिछले महीने देवनानी पर प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए बीजेपी से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि इस विवाद के बावजूद माना जा रहा है कि देवनानी और पूर्व मंत्री व विधायक अनीता भदेल के लिए ये चुनाव आसान परीक्षा है। इधर, कांग्रेस के पास यहां प्रभाव छोड़ने वाले नेताओं की कमी है।
कांग्रेस की बागडोर जिला अध्यक्ष राजकुमार जयपाल, प्रदेश कांग्रेस सचिव रूबी खान, डेयरी चेयरमैन रामचंद्र चौधरी, श्रीगोपाल बाहेती जैसे नेता संभाल रहे हैं। पूर्व आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेंद्र राठौड़ इन चुनावों में सक्रिय हैं।

कहीं सार्वजनिक सभाओं तो कहीं जनसंपर्क कर वोटर्स को साधने की कोशिश की जा रही है।
जातिगत प्रभाव : ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग बड़ा है, जो एकजुट होकर वोट कर सकता है। ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य वोटर भी हैं। मुस्लिम, सिंधी और क्रिश्चियन समाज के वोटर भी कुछ वार्डों में प्रभाव डालते हैं। हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण भी राजनीतिक पार्टियों को फायदा देता है।


निगम के सबसे बड़े मुद्दे
- सरकारी तंत्र/प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, निगम कर्मचारियों की बार-बार हड़ताल
- मुस्लिम बहुल्य भीतरी इलाकों में अतिक्रमण, नाली सफाई, कचरा प्रबंधन, पीने का पानी
- बेतरतीब यातायात, संकरी सड़कें, पार्किंग आदि की समस्या



बीकानेर
दोनों पार्टियों ने पुराने चेहरों पर खेला दांव
बीजेपी में संगठन स्तर पर एक-एक प्रत्याशी के पास उस क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को एकजुट किया जा रहा है, जबकि कांग्रेस में संगठनात्मक स्तर पर कोई सपोर्ट पार्षद प्रत्याशी को नहीं मिलता दिख रहा।
कांग्रेस को बीजेपी सरकार और पुराने बीजेपी के बोर्ड की एंटी इनकमबेंसी का फायदा मिल सकता है। वहीं यूजीसी बिल का मुद्दा भी कुछ वार्डों पर असर डाल सकता है।
बीजेपी और कांग्रेस ने पुराने चेहरों पर ज्यादा दांव खेला है। बीजेपी के पूर्व मेयर सुशीला राजपुरोहित, पार्टी महासचिव श्याम सिंह हाडला, वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह शेखावत, कोषाध्यक्ष रह चुके दीपक पारीक, जैसे नेता पूरा दमखम के साथ मैदान में हैं।
इधर, कांग्रेस के पूर्व मेयर मकसूद अहमद, मंत्री रहे बीडी कल्ला के बेटे अनिल कल्ला, संजय आचार्य जैसे नेता अच्छी टक्कर दे रहे हैं।

जातिगत प्रभाव : पुष्करणा ब्राह्मण और वैश्य वर्ग की आबादी ज्यादा है, जो चुनाव को सीधा प्रभावित कर सकती है। जाट, कुम्हार, सुथार, बिश्नोई समाज भी ओबीसी का अच्छा वोट बैंक बनाता है। कुछ वार्डों में मुस्लिम व एससी-एसटी का अच्छा वोट बैंक है।

निगम के 3 सबसे बड़े मुद्दे
- निगम की पिछली ढीली कार्य प्रणाली
- बेतरतीब यातायात, संकरी व टूटी सड़कें, पार्किंग आदि की समस्या
- शहर में अतिक्रमण, सफाई व्यवस्था खराब, सिवर लाइन के धीमे काम से बदहाली



भीलवाड़ा
कांग्रेस के बड़े नेताओं ने बनाई चुनाव से दूरी, स्थानीय भी रूठे
कांग्रेस के सिंबल बंटवारे के विवाद ने बीजेपी की राह और आसान कर दी है। पहले, भीलवाड़ा के शहरी निकायों के टिकटों को लेकर हुई बैठक में पूर्व मंत्री रामलाल जाट और पूर्व विधायक धीरज गुर्जर भिड़ गए।
दोनों अनुभवी नेताओं ने चुनाव से दूरी बनाई हुई है। हालांकि, धीरज गुर्जर अपने समर्थक कुछ कैंडिडेट के साथ चुनाव प्रचार में नजर आए हैं।
इन दोनों नेताओं के साथ स्थानीय नेता भी सिंबल विवाद के कारण रूठे हुए हैं। दूसरा सिंबल समय पर नहीं दे पाने से केवल 70 में से 53 सीटों पर ही कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं।
कांग्रेस शहर अध्यक्ष शिवराम खटीक ने भी माना कि पहले बड़े नेताओं की दूसरी और सिंबल बंटवारे को लेकर जो कुछ हुआ, दुर्भाग्यपूर्ण है।
अब बस कांग्रेस में शहर जिला अध्यक्ष शिव राम खटीक सहित कुछ स्थानीय नेता निकाय चुनाव में सक्रिय हैं। वहीं बीजेपी में सांसद दमोदर अग्रवाल, बीजेपी को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी, पूर्व सांसद सुभाष चंद्र बहेड़िया, पूर्व विधायक विट्ठल शंकर अवस्थी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं।
बीजेपी ने भी टिकट बांटने के दौरान इन नेताओं की पूरी सुनवाई की थी।

प्रत्याशी अलग-अलग तरीकों से मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
जातिगत प्रभाव : जैन, अग्रवाल, महेश्वरी सहित अन्य वर्गों से भी व्यापार से जुड़े लोग ज्यादा होने के कारण यहां ध्रुवीकरण प्रभाव डालता है, जिससे बीजेपी को फायदा मिलता है।
यहां ब्राह्मण मतदाता भी कई वार्ड में प्रभाव रखते हैं। वहीं, कई वार्डों में जाट, गुर्जर, कुमावत, माली वोटर्स की संख्या चुनाव को प्रभावित करती है।


निगम के 3 सबसे बड़े मुद्दे
- कई वार्डों में सीवरेज लाइनों की कमी
- टूटी सड़कें और बाहरी वार्डों में नई सड़कों की मांग
- भू-माफिया और अतिक्रमण करने वालों से जनता परेशान








