
देवली में मुनि सुप्रभ सागर महाराज और मुनि वैराग्य सागर महाराज ने प्रवचन दिए। मुनि वैराग्य सागर ने गुंसी में विज्ञाश्री माताजी के सानिध्य में 23 अगस्त को होने वाली जैनेश्वरी दीक्षा के लिए देवली आई दीक्षार्थी दीदियों को संबोधित किया। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में कर्मों की निर्जरा के महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्य में पूजा के महत्व पर प्रवचन दिया मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने छठ आवश्यक कार्य में पूजा के महत्व पर प्रवचन दिया। उन्होंने बताया- पूजा की शुरुआत मंगलाष्टक से करनी चाहिए। इसके बाद जल शुद्धि के लिए मंत्रों द्वारा जलधारा छोड़ते हुए क्षीरसागर की स्थापना की जाती है, जिससे जल और अधिक पवित्र हो सके।
उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि क्षीरसागर के जल में विकलत्रय जीव नहीं पाए जाते, इसलिए उसे छानने की आवश्यकता नहीं होती। अभिषेक के लिए लाए गए जल का उपयोग भी पूरी सावधानी से करने पर जोर दिया गया, ताकि कर्मों की निर्जरा हो सके।
मुनि वैराग्य सागर ने दीक्षार्थी दीदियों से कहा- दीक्षा तभी सार्थक होती है जब राग-द्वेष, स्वजन-परजन और अंतर कषायों का त्याग किया जाए। उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही कि कर्मों की निर्जरा केवल प्रतिकूलता में ही होती है, अनुकूलता में नहीं। उन्होंने दीक्षार्थियों को जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को साधना का अवसर मानकर स्वीकार करने की प्रेरणा दी।
उन्होंने ये भी बताया कि आहार, सामायिक और प्रवचन से पहले मौन धारण करना चाहिए। आचार्यों के अनुसार, यदि कोई स्वयं दीक्षा न ले सके तो धर्म प्रभावना के लिए दीक्षार्थियों की गोद भराई कर उनकी अनुमोदना करनी चाहिए। साथ ही, ये भावना भी रखनी चाहिए कि दीक्षार्थियों को अंत समय में समाधि मरण प्राप्त हो।
प्रवचन के समापन पर समाज के लोगों द्वारा दीक्षार्थी दीदियों की गोद भराई की गई और उनके पुण्य की अनुमोदना की गई।






