क्या बांग्लादेश बॉर्डर वाले गांवों में लूटपाट-छेड़छाड़ रुकी:जमीन मिली लेकिन फेंसिंग मुश्किल, रास्ता बदलती नदी, BSF कैंप डूबा

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बात 11 अगस्त की है, पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में रहने वाले सचिन कर्मकार और नारायण देव खेत में काम कर रहे थे। तभी बांग्लादेशियों का झुंड गांव में घुसा और दोनों को अगवा कर ले गया। इससे पहले 8 अगस्त को जलपाईगुड़ी में चाय व्यापारी दीपांकर घोष को घुसपैठ कर आए 20 बांग्लादेशी उठा ले गए। ये सिर्फ नादिया या जलपाईगुड़ी का हाल नहीं है।

बंगाल में बॉर्डर पर मौजूद भारत के आखिरी गांवों में लोग आए दिन ये सब झेल रहे हैं। सरकार बदलने के बाद अब पश्चिम बंगाल के इन इलाकों का हाल जानने दैनिक भास्कर की टीम 4 गांवों में पहुंची। यहां बॉर्डर पर फेंसिंग नहीं। घुसपैठ के लिए ये सबसे आसान रास्ते हैं। गांव वाले बताते हैं कि रात को 40-50 घुसपैठिए गांव में घुस आते और लूटपाट करते। महिलाओं और बेटियों से छेड़छाड़ की जाती। डरे गांववाले रातभर पहरा देते।

बांग्लादेश की बंगाल से 2,217 किलोमीटर सीमा लगती है। इसमें से 9 जिलों में 569 किमी के बॉर्डर पर फेंसिंग नहीं है। इसमें से भी 113 किमी के हिस्से में नदी और जंगल की वजह से फेंसिंग कर पाना मुमकिन ही नहीं।

पहला गांव- रानाघाट, नादिया ‘रात में कट्टा दिखाकर लूटते, बहू-बेटियां भी छेड़ते’

सबसे पहले नादिया के रानाघाट गांव पहुंचे। बॉर्डर पर तैनात BSF जवानों ने हमें रोककर आने की वजह पूछी। आईडी कार्ड दिखाया तो आगे जाने दिया। थोड़ा आगे बढ़ते ही कोई ताश खेलते तो कोई चाय पीते मिला। घुसपैठ के बारे में पूछते ही वे पुराने किस्से याद करने लगे।

गांव में रहने वाले गौतम अधिकारी बताते हैं, ‘पहले यहां घुसपैठ आम बात थी। रात के अंधेरे में बांग्लादेशी नदी पार कर गांव में घुस आते थे। हमने कई बार घुसपैठ करते देखा। पुलिस से भी शिकायत की, लेकिन तब कोई कार्रवाई नहीं हुई।‘

पास में बैठे राजू बिस्वास बताते हैं, ‘बांग्लादेशी रात में आते और गाय-भैंस खोल ले जाते थे। घर से राशन और कीमती सामान भी लूट ले जाते। कभी 10-20 लोग आते, तो कभी 50। उनके पास कट्टे और हथियार होते थे। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी देते। कई बार महिलाओं से छेड़छाड़ हुई। बहू-बेटियां भी सुरक्षित नहीं थीं।‘

क्या अब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, इस पर राजू कहते हैं, ‘अब सुरक्षा पहले से ज्यादा है। पहले 10-12 गांवों में BSF की दो-तीन चौकियां थीं। गश्त भी कभी-कभार होती थी। अब लगभग हर 100 मीटर पर जवान तैनात हैं। दिन-रात निगरानी होती है। अब हम पहले से ज्यादा निश्चिंत हैं!

‘इच्छामती नदी के घुमावों से बढ़ी BSF की मुश्किल‘

नदी के किनारे पहरा दे रहे BSF जवान से हमने बात करने की कोशिश की। कैमरे पर नहीं आए, लेकिन ऑफ द रिकॉर्ड बताया, ‘हमारी एक कंपनी करीब 10 किलोमीटर बॉर्डर की निगरानी करती है, जिसमें लगभग 100 जवान होते हैं। सबसे बड़ी चुनौती यहां की भौगोलिक स्थिति है।‘

‘इच्छामती नदी एक सीध में नहीं बहती। कई जगह घुमाव हैं, इसलिए एक जगह से 400-500 मीटर के बाद साफ नहीं दिखता। रात में चुनौती बढ़ जाती है। हालांकि अब नाइट विजन वाले नए उपकरण आए हैं, जिनसे बेहतर निगरानी हो रही है।‘

‘यहां फेंसिंग का काम भी शुरू हो चुका है। फिलहाल रासकोल से तारबंदी की शुरुआत हुई है। इसे आगे बढ़ाते हुए रानाघाट तक ले जाया जाएगा। फिर पूरे इलाके की फेंसिंग की जाएगी।‘

दूसरा गांव- कुलिया, नादिया ‘खुशी-खुशी जमीन दी, लेकिन मुआवजा पूरा नहीं मिला’

रानघाट से थोड़ी दूर कुलिया गांव है। यहां पहुंचते ही बॉर्डर के पास पत्थर के दो खंभे दिखे। ग्रामीणों ने बताया कि ये जीरो पॉइंट है। यहीं से फेंसिंग शुरू होगी। गांव के रहने वाले अभिराज दास बताते हैं, ‘ये खंभे ममता बनर्जी की सरकार में लगाए गए थे, लेकिन जमीन लेने की प्रक्रिया BJP सरकार आने के बाद शुरू हुई।‘

क्या तारबंदी में आपकी भी जमीन गई है, जवाब मिला, ‘हां, घुसपैठ से परेशान थे, इसलिए खुशी से जमीन दी। पहले कब चोरी हो जाए, कब कौन बांग्लादेशी घुस आए, पता नहीं चलता था। अगर फेंसिंग से सुरक्षा बढ़ती है, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है।‘

मुआवजे के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘चार कट्ठा जमीन के बदले सरकार ने 50 हजार रुपए दिए। जबकि जमीन लेते वक्त कहा था कि इस पर बने घर का भी मुआवजा मिलेगा, लेकिन आज तक नहीं मिला। कई बार हेलेंचा में रजिस्ट्री ऑफिस के चक्कर भी लगा चुके हैं।‘

तीसरा गांव- राधाकृष्णपुर, मुर्शिदाबाद जहां हर साल रास्ता बदलती है नदी, वहां फेंसिंग कैसे होगी?

इसके बाद हम मुर्शिदाबाद के राधाकृष्णपुर गांव पहुंचे। यहां देखते ही समझ आ जाता है कि फेंसिंग में इतनी मुश्किल क्यों हैं। ये चार नदी के टापुओं वाला इलाका है। पद्मा नदी हर साल अपना रास्ता बदलती है। नदी की धारा बदलते ही कहीं जमीन कटकर बह जाती है, तो कहीं सिल्ट जमने से अस्थायी नई जमीन बन आती है। ऐसे में आज जहां फेंसिंग होगी, अगले साल वहां जमीन बची रहे, ये जरूरी नहीं।

कटान का असर पूरे गांव पर दिखता है। यहां रहने वाले प्रदीप साहा बताते हैं, ’राधाकृष्णपुर का करीब आधा हिस्सा नदी में समा चुका है। कभी गांव में चार पंचायत सदस्य हुआ करते थे, लेकिन जमीन कम होने के बाद लोगों ने गांव छोड़ दिया। अब सिर्फ एक पंचायत सदस्य बचे हैं।’

प्रदीप हमें नदी किनारे ले गए। सामने की ओर इशारा करते हुए बोले, ’नदी के कटान में पूरा लारूखाकीदियार गांव बह गया। पहले वहां BSF की छावनी थी। कटान के बाद उसे भी हटाना पड़ा। अब उस पार कोई स्थायी तैनाती नहीं है। जरूरत पड़ने पर BSF के जवान नाव से वहां गश्त करने जाते हैं।’

BSF को 1,024 एकड़ जमीन मिली, लेकिन फेंसिंग अब भी मुश्किल

पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार ने 6 जुलाई को फेंसिंग के लिए 1,024 एकड़ जमीन BSF को सौंप दी है, लेकिन सिर्फ इससे फेंसिंग शुरू नहीं हो जाती। इसे मुर्शिदाबाद के लैंड एंड रिफॉर्म अफसर ऑफ द रिकॉर्ड समझाते हैं।

उन्होंने बताया, ‘फेंसिंग शुरू होना आखिरी स्टेप है। इससे पहले कई चीजें की जाती हैं। हम पिछले दो महीने से दिन-रात जमीन अधिग्रहण के काम में लगे हैं। ज्यादातर किसान खुद अपनी जमीन दे रहे हैं, लेकिन कहीं-कहीं किसानों से जिरह भी करनी पड़ती है।‘

वे जमीन अधिग्रहण की तरीका बताते हुए कहते हैं,

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सबसे पहले सर्वे ऑफ इंडिया (SoI) के अधिकारी BSF की सुरक्षा में सीमा का सर्वे करते हैं। वे देखते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से 140 मीटर की दूरी पर फेंसिंग कहां बनाई जा सकती है। अगर उस जगह नदी, कटान या दलदली जमीन हो, तो फेंसिंग की लाइन थोड़ा अंदर तय की जाती है।QuoteImage

‘इसके बाद BSF के अधिकारी सफेद झंडे लगाकर जमीन की निशानदेही करते हैं। फिर जिन किसानों की जमीन फेंसिंग के लिए चाहिए, उन्हें नोटिस भेजा जाता है और जमीन के दस्तावेज मांगे जाते हैं।‘

‘दस्तावेजों की जांच के बाद जमीन की कीमत तय होती है। सहमति न बनने पर कई दौर की बातचीत होती है। कई बार शुरुआती वैल्यूएशन से करीब दो गुना तक मुआवजा देकर सहमति बनती है। अगर किसान NOC दे देते हैं, तो मुआवजे का चेक देकर जमीन BSF को सौंप दी जाती है।’

हालांकि, उनके दफ्तर में मौजूद दूसरे अधिकारी कहते हैं, ’खेती-किसानी प्रभावित होने से गांव वाले विरोध करते हैं, जिसके बाद भी कई जगह फेंसिंग का काम अटक जाता है।’

चौथा गांव- खांडुआ, मुर्शिदाबाद फेंसिंग कैसे शुरू हो, कोई गाइडलाइन नहीं मिली

इसके बाद हम मुर्शिदाबाद के ही खांडुआ गांव पहुंचे। यहां मिले BSF के एक अधिकारी से हमने पूछा कि यहां फेंसिंग मुश्किल क्यों है?

वे बताते हैं, ’यहां जमीन मिल चुकी है, लेकिन फेंसिंग कैसे शुरू होगी, इसकी अभी तक कोई गाइडलाइन नहीं आई है। उम्मीद है जल्द निर्देश मिलेंगे। तब तक हमने स्मार्ट पेट्रोलिंग शुरू कर दी है। आने वाले समय में सेंसर, सर्विलांस और दूसरी हाईटेक तकनीकें भी मिलेंगी। इनके बिना इस पूरे इलाके पर नजर रखना आसान नहीं है। सिर्फ फेंसिंग के भरोसे यहां सीमा की सुरक्षा नहीं की जा सकती।’

अधिकारी आगे कहते हैं, ’हमने पहले भी यहां फेंसिंग की थी, लेकिन नदी का बहाव इतना तेज था कि राम नगर के पास तार बह गए। अभी मरम्मत चल रही है। यहां फेंसिंग बना देना ही काफी नहीं है, उसे बचाकर रखना ज्यादा बड़ी चुनौती है।’

जमीन के बिना 90 किमी की फेंसिंग 10 साल तक अटकी

BSF में हमारे सूत्र बताते हैं, ‘2017 में हमारे बड़े अधिकारियों ने 273 किलोमीटर के बॉर्डर की फेंसिंग का प्रस्ताव भेजा था, जिसमें 4 आइलैंड का इलाका शामिल है। गृह मंत्रालय ने भुगतान किया और ममता सरकार ने 238 किलोमीटर के फेंसिंग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। जहां तक मुझे पता है कि 90 किलोमीटर तक की जमीन हमें नहीं मिली थी, जो अब मिली है।‘

जमीन अधिग्रहण का काम देख रहे एक अधिकारी से जब हमने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा, ‘कई जगह तय सीमा से ज्यादा जमीन की जरूरत थी, लेकिन लोग देने को राजी नहीं थे। सरकार भी कई मामलों में आगे नहीं आती थी। इस बार साफ निर्देश था कि हर हाल में जमीन अधिग्रहण पूरा करना है। सरकार बदलने के बाद लोगों ने भी जमीन देनी शुरू कर दी।‘

पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर फेंसिंग का काम तेजी से चल रहा है। कहीं नई बाड़ लग रही है, तो कहीं पुरानी फेंसिंग की मरम्मत हो रही है। सरकार BSF को जमीन सौंप रही है।

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