देवली, 1 घंटे पहले

देवली में परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागर महाराज का 72वां समाधि दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। इस मौके पर धार्मिक कार्यक्रम हुए और आचार्य श्री के जीवन, तप, त्याग और संयम को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी गई।

कार्यक्रम में मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने कहा कि एक साधक अपने जीवन के अंत को भी महोत्सव की तरह मनाता है। दिगंबर जैन श्रमण परंपरा को फिर से शुरू करने वाले आचार्य श्री शांतिसागर जी महामुनिराज ने अपने संयमी जीवन का अंत सल्लेखना मरण महोत्सव के साथ किया था। उनका पूरा जीवन समाज के लिए प्रेरणा देने वाला और सिखाने वाला है।
उन्होंने बताया कि आज कई लोग ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ सिखाते हैं, लेकिन जैन दर्शन जीवन जीने के साथ-साथ ‘आर्ट ऑफ डाइंग’ भी सिखाता है। जैन श्रमण अपने संयम की रक्षा के लिए शरीर तक का त्याग करने को तैयार रहते हैं। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने 36 दिनों तक सल्लेखना की साधना करते हुए सभी जीवों को संयम की प्रेरणा दी और आत्मचिंतन का संदेश दिया।




