BJP प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गढ़ में कैसे हारी पार्टी:गुटबाजी-बागियों ने बिगाड़ा खेल; कांग्रेस ने आखिरी समय किया डैमेज कंट्रोल

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राजस्थान

नगर निकाय चुनाव में भाजपा को प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले में ही हार झेलनी पड़ी। पाली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की 6 प्रत्याशियों के नामांकन खारिज होने और एक प्रत्याशी के भाजपा को समर्थन देने से खूब किरकिरी हुई थी।

लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी करते हुए 29 वार्डों में जीत दर्ज की। वहीं, 65 में से भाजपा के महज 21 प्रत्याशी ही जीत पाए।

यहां 15 निर्दलीय प्रत्याशियों ने बाजी मारी है। इनमें से 9 अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वर्ग से है, जो कांग्रेस विचारधारा के माने जाते हैं। यानी पाली मे कांग्रेस का बोर्ड बनना लगभग तय माना जा रहा है। आखिर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के गढ़ में कांग्रेस कैसे जीत गई? पढ़िए इस रिपोर्ट में..

भाजपा की हार 3 बड़े फैक्टर

1 . जिलाध्यक्ष भंडारी और पूर्व विधायक पारख गुट में बंटी पार्टी

पाली शहर में नगर निगम के वार्ड नंबर 40 में शामिल आदर्श नगर इलाके में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ पुश्तैनी मकान है। इसी आदर्श नगर में पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख का भी मकान है।

हालांकि मदन राठौड़ पिछले कुछ सालों से टैगोर नगर इलाके में सर्किट हाउस के सामने नए बंगले में रहते हैं। राठौड़ और पारख के बीच सियासी दूरियां जग जाहिर हैं।

वहीं, राठौड़ के करीबी भाजपा जिलाध्यक्ष सुनील भंडारी और पारख के बीच भी पटरी नहीं बैठती। यही वजह रही कि जिन नेताओं को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी थी, वही नेता दो गुटों में बंट गए।

पूर्व विधायक पारख के कई करीबियों के टिकट कट गए। दस साल पहले पारख के वार्ड-40 से सुनील भंडारी को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया था, लेकिन पारख ने अपने खास समर्थक किशोर सोमनानी को निर्दलीय चुनाव जितवा दिया।

इस बार भी सोमनानी को भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने अपनी पत्नी पुष्पा को निर्दलीय चुनाव लड़ाया और जीत दिलाई। भंडारी और पारख अपने-अपने करीबियों को टिकट दिलाए। पार्टी के कार्यकर्ता भी नेताओं की गुटबाजी में फंसे रहे और खुलकर प्रचार नहीं कर पाए।

2. बागियों ने बिगाड़ा भाजपा का गणित, छह में से चार जीत गए

भाजपा के 6 प्रत्याशी बागी हो गए। पूर्व सभापति कुसुम सोनी, पूर्व पार्षद किशोर सोमनानी की पत्नी, कांतिलाल वैष्णव, पूर्व पार्षद जय जसवानी, निर्मल जोशी, महेंद्र वैष्णव ने टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ा।

इन नेताओं ने भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी कर भाजपा का गणित बिगाड़ दिया। बागियों में पूर्व सभापति कुसुम सोनी, किशोर सोमनानी की पत्नी पुष्पा और कांतिलाल वैष्णव और निर्मल जोशी निर्दलीय चुनाव जीत गए।

वहीं दो सीटों पर बागी महेंद्र वैष्णव और जय जसवानी भले ही चुनाव हार गए लेकिन भाजपा प्रत्याशियों को भी यहां वोटबैंक में सेंधमारी के चलते हार का सामना करना पड़ा।

3. फैक्ट्रियां बंद और सीएम के दौरे को कांग्रेस ने भुनाया

पाली शहर की लाइफ लाइन माने जाने वाली कपड़ा इंडस्ट्रीज चार माह से बंद है। मजदूर पलायन कर चुके हैं और कई व्यापारियों ने अपनी फैक्ट्रियां गुजरात शिफ्ट कर दी।

फैक्ट्रियां बंद होने से करीब 50 हजार मजदूर बेरोजगार हो गए। इसका असर पाली के लोकल मार्केट पर भी पड़ा। इससे व्यापारी और मजदूरों में इस बात को लेकर आक्रोश है कि सरकार के स्तर पर फैक्ट्रियां शुरू करने के लिए कोई सकारात्मक प्रयास नहीं हुए।

मतदान से दो दिन पहले सीएम भजनलाल शर्मा ने प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ समेत अन्य नेताओं के साथ पाली में रोड शो किया। इस दौरान लोगों ने शहर की फैक्ट्रियां शुरू करने का शोर मचाया।

इस मुद्दे को कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर खूब भुनाया। इससे भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में बज क्रिएट हुआ।

8 सितंबर को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो की तस्वीर।

8 सितंबर को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो की तस्वीर।

अब पढ़िए कांग्रेस की जीत के 4 बड़े फैक्टर

1 . चुनाव प्रबंधन में हारी, लेकिन वोटिंग से पहले वापसी

कांग्रेस के टिकट बंटवारे के दौरान कांग्रेस को खूब किरकिरी झेलनी पड़ी थी, क्योंकि 6 प्रत्याशियों के नामांकन खारिज हो गए। लेकिन समय रहते कांग्रेस जिलाध्यक्ष शिशुपालसिंह और विधायक भीमराज भाटी डैमेज कंट्रोल में लग गए।

भाजपा के निलंबित पूर्व चेयरमैन रेखा भाटी और उनके पति राकेश भाटी को कांग्रेस में शामिल किया। कांग्रेस ने राकेश भाटी का इस्तेमाल भाजपा की रणनीति का तोड़ निकालने में किया।

भाटी हर वार्ड की गणित और भाजपा नेताओं के बीच चल रही गुटबाजी को जानते थे। इधर, पूर्व सभापति प्रदीप हिंगड़ ने जिन 6 वार्डों में कांग्रेस प्रत्याशियों के नामांकन खारिज हुए, वहां निर्दलीयों को साधते हुए पार्टी के पक्ष में किया और चुनाव प्रचार की रणनीति संभाली।

भाजपा नेता राकेश भाटी (गले में दुपट्‌टा) पाली विधायक भीमराज भाटी और कांग्रेस जिलाध्यक्ष शिशुपाल सिंह।

भाजपा नेता राकेश भाटी (गले में दुपट्‌टा) पाली विधायक भीमराज भाटी और कांग्रेस जिलाध्यक्ष शिशुपाल सिंह।

ऐसा पहली बार हुआ कि कांग्रेस ने सभी गुटों को साध लिया। पाली के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा। विधायक और जिलाध्यक्ष के साथ पूर्व सभापति की प्लानिंग काफी काम आई।

2. अल्पसंख्यक वोटरों की एकजुटता ने कांग्रेस को संजीवनी दी

पाली शहर में अब तक के इतिहास में अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वर्ग से 9 निर्दलीय उम्मीदवार पहली बार जीते हैं। 9 में से 3 उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट पर जीते हैं। यानी कुल 65 वार्डों में से अब 12 उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से हैं।

विश्लेषकों की मानें तो इस बार अल्पसंख्यक वर्ग ने वोटों का बंटवारा होने नहीं दिया। केवल जिताऊ उम्मीदवार पर ही दांव खेला। भाजपा ने मुस्लिम समुदाय से 3 प्रत्याशियों को टिकट दिया था, लेकिन उनमें एक भी जीत दर्ज नहीं कर पाया।

इस एकतरफा वोटिंग ने कांग्रेस के लिए संजीवनी के रूप में काम किया। भाजपा 12 वार्डों में कहीं भी बढ़ नहीं बना पाई।

तस्वीर, जीत के बाद की है। यहां सभी पार्टियों के समर्थक रिजल्ट आने के बाद अपने प्रत्याशी के लिए जश्न मनाते नजर आए।

तस्वीर, जीत के बाद की है। यहां सभी पार्टियों के समर्थक रिजल्ट आने के बाद अपने प्रत्याशी के लिए जश्न मनाते नजर आए।

वार्ड नंबर 11 में कांग्रेस ने लीला देवी चौधरी को टिकट दिया, जो नगर निगम में महापौर प्रत्याशी मानी जाती थी। इस वार्ड में भाजपा ने सुमित्रा मेवाड़ा को टिकट दिया। वार्ड में अल्पसंख्यक वर्ग से शबनम खिलजी को उतारा और उसे ही जीता दिया।

वार्ड 17 में कांग्रेस-भाजपा ने हिन्दू वर्ग से उम्मीदवार उतारे तो निर्दलीय सुलेमान को जीता दिया। ऐसा ही वार्ड 12 में हुआ, जहां निर्दलीय असलम जीत गए। अब इन 9 निर्दलीय उम्मीदवारों से ही कांग्रेस की बोर्ड बनाने की राह आसान होगी।

3. सभी गुटों को साधा

टिकट बंटवारे में कांग्रेस ने जितने वाले कैंडिडेंट को टिकट दिया। साथ ही कुछ एजडस्ट टिकट भी दिए। कांग्रेस की महिला जिलाध्यक्ष नीलम बिड़ला तक को मैदान में उतारा गया, लेकिन वो हार गई। वरिष्ठ कांग्रेसी जब्बरसिंह राजपुरोहित के भाई गजेंद्र सिंह को टिकट दिया गया, लेकिन वो भी चुनाव नहीं जीत पाए। इस तरह से कांग्रेस ने सात ऐसे टिकट दिए, जिसमें जीत की संभावना कम थी, लेकिन कई गुटों को साध लिया।

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