
दैनिक भास्कर इन्वेस्टिगेशन के पार्ट-1 में आपने पढ़ा और देखा कि उज्जैन सिंहस्थ मेला क्षेत्र में बिजली लाइन शिफ्टिंग के करीब ₹250 करोड़ के काम में गड़बड़ी की गई। पड़ताल में बिजली विभाग के अफसरों और ठेकेदारों की कथित मिलीभगत के संकेत मिले।

अब भास्कर की पड़ताल में विभागीय गलियारों में ‘मालवीय एंड एसोसिएट्स’ के नाम से चर्चित कथित सिंडिकेट की भूमिका सामने आई है। भास्कर रिपोर्टर ने ठेकेदार बनकर स्टिंग किया तो सिंडिकेट से जुड़े लोगों ने अफसरों के साथ मिलकर काम ‘मैनेज’ करने की बात कही।
पड़ताल में एक और चौंकाने वाला कनेक्शन सामने आया-विभाग में आउटसोर्स पर ड्राइवर के तौर पर काम करने वाला व्यक्ति GST दस्तावेजों में एक इंडस्ट्री का प्रोपराइटर दर्ज है।
आखिर कैसे काम करता है यह कथित सिंडिकेट? इसके पीछे कौन लोग हैं? और बिना सैंपल दिए बिजली के सामान की टेस्ट रिपोर्ट कैसे पास हो जाती है? पढ़िए भास्कर इन्वेस्टिगेशन का पार्ट-2

कैसे काम करता है यह कथित सिंडिकेट? 7 कड़ियों में समझें
भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन में कथित सिंडिकेट के काम करने का तरीका सामने आया। पड़ताल के मुताबिक, इसकी गतिविधियां सहायक यंत्री रविकांत मालवीय की देखरेख में संचालित होने की बात सामने आई।
- ठेकेदारों पर सब-कॉन्ट्रैक्ट का दबाव: आरोप है कि PWD या उज्जैन विकास प्राधिकरण का काम लेने वाले ठेकेदारों पर बिजली लाइन शिफ्टिंग का सब-कॉन्ट्रैक्ट देने का दबाव बनाया जाता है। मना करने पर एस्टीमेट रोकने, लाइन शटडाउन नहीं देने और काम रुकवाने की धमकी देने की बात सामने आई।
- तय कमीशन: आरोप है कि दबाव में ठेकेदार काम सिंडिकेट को सौंप देता है और बदले में तय कमीशन लेकर काम से अलग हो जाता है। इसके बाद काम में उसका दखल नहीं रहता।
- नया मटेरियल गायब, साइट पर पुरानी सामग्री: आरोप है कि ठेकेदार के नाम पर जारी नया मटेरियल दूसरी जगह इस्तेमाल किया जाता है और साइट पर पुरानी लाइनों से उतारी गई जंग लगी या अमानक सामग्री लगा दी जाती है।

बिजली के पोल में जोड़ साफ देखा जा सकता है।
- बिना जांच हैंडओवर: आरोप है कि तकनीकी और सुरक्षा मानकों की जांच के बिना कागजों में काम पूरा दिखाकर हैंडओवर लिया जाता है। इसके बाद ठेकेदार के नाम पर बिल पास कराए जाते हैं।
- सरकारी लेबर से निजी काम: आरोप है कि बिजली विभाग के आउटसोर्स कर्मचारियों से काम कराया जाता है, जबकि रिकॉर्ड में प्राइवेट लेबर दिखाकर लाखों रुपए का भुगतान लिया जाता है।
- काम भी खुद, जांच भी खुद: आरोप है कि साइट इंचार्ज और तकनीकी पर्यवेक्षक की भूमिका में रविकांत मालवीय अपने ही काम की गुणवत्ता को प्रमाणित करते हैं।
- माप पुस्तिका में फर्जी एंट्री: आरोप है कि ईई सतीश कुमरावत की मिलीभगत से माप पुस्तिका (MB) में कथित फर्जी एंट्री दर्ज कर करोड़ों रुपए के बिल पास कराए जाते हैं।

रविकांत मालवीय के साइन से ही पुरानी सामग्री स्टोर में जमा होती थी।
₹12 हजार का आउटसोर्स ड्राइवर, ₹3 करोड़ की पोल फैक्ट्री का मालिक
भास्कर की पड़ताल में आरोप सामने आया कि रविकांत मालवीय ने इस कारोबार को संचालित करने के लिए अपने रिश्तेदार विजेंद्र मालवीय का इस्तेमाल किया।
- कागजों पर हैसियत: विजेंद्र विभाग में आउटसोर्स वाहन चालक है। दस्तावेजों के मुताबिक, उसे ₹10,000 से ₹12,000 मासिक आउटसोर्स वेतन मिलता है।वह रविकांत मालवीय की निजी गाड़ी चलाता है।

- हकीकत में हैसियत: जीएसटी के आधिकारिक दस्तावेजों में यही व्यक्ति ‘स्वरा इंडस्ट्रीज’ का एकमात्र प्रोपराइटर दर्ज है।
- ₹3 करोड़ की जमीन: उज्जैन के बड़कुमेद रोड पर स्वरा इंडस्ट्रीज की करीब आधा बीघा जमीन है, जिसका खसरा नंबर 148/3/1 है। रजिस्ट्री रविकांत मालवीय और उनकी पत्नी स्वाति गोखले के नाम पर दर्ज है।
- इसी फैक्ट्री से खंभे खरीदने का आरोप: इसी जमीन पर PCC Poles बनाने की फैक्ट्री है, जो पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की वेंडर लिस्ट में 58वें नंबर पर दर्ज है। ठेकेदारों का आरोप है कि उन्हें यहीं से खंभे खरीदने के लिए कहा जाता है और ऐसा नहीं करने पर बिल रोकने का दबाव बनाया जाता है।







