राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी जब साथ आती है तो उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं। घायल, दामिनी और घातक के बाद बटवारा 1947 में यह जोड़ी 1947 के बंटवारे की पृष्ठभूमि में फिर से नजर आती है। इस बार कहानी में गुस्सा और बदला कम और इंसानियत और रिश्तों की बात ज्यादा है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका इमोशनल असर है, खासकर सनी देओल और शबाना आजमी के बीच बनने वाला रिश्ता।

कैसी है फिल्म की कहानी?
कहानी बंटवारे के समय लाहौर पहुंचे सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) और उनके परिवार के आसपास घूमती है। उन्हें एक घर मिलता है जहां पहले से एक बुजुर्ग हिंदू महिला माई (शबाना आजमी) रह रही होती हैं और वह घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ नया देश, बदलते हालात और परिवार की मुश्किलें हैं, दूसरी तरफ माई का अपने घर से गहरा लगाव है।
इन हालात में सिकंदर और माई के बीच रिश्ता धीरे-धीरे बदलता है। जो शुरुआत में एक दूसरे के लिए परेशानी होते हैं, वही आगे चलकर एक परिवार जैसा जुड़ाव बना लेते हैं। यही बदलाव फिल्म का सबसे मजबूत और दिल को छूने वाला हिस्सा है। सिकंदर की पत्नी हमीदा (प्रीति जिंटा) और बाकी किरदार भी अपनी सोच और डर के साथ कहानी में आते हैं, लेकिन फिल्म के दूसरे हिस्से में सबके नजरिए में बदलाव दिखता है।
कैसी है कलाकारों की एक्टिंग?
सनी देओल इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। सिकंदर के किरदार में उनका गुस्सा और दमदार डायलॉग तो है ही, लेकिन इस बार उनके चेहरे पर डर, दर्द और बेबसी भी साफ दिखती है। शबाना आजमी माई के रोल में बहुत ही सहज और सच्ची लगती हैं। दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म की जान बन जाती है।

प्रीति जिंटा लंबे समय बाद एक गंभीर रोल में अच्छी लगती हैं और अपना असर छोड़ती हैं। करण देओल भी अपने पिता के सामने कई सीन में ठीक ठाक परफॉर्म करते हैं, कुछ जगह अच्छे लगते हैं और कुछ जगह और बेहतर हो सकते थे। अभिमन्यु सिंह और बाकी सपोर्टिंग कलाकार अपने हिस्से में ठीक काम करते हैं।







