बैगा आदिवासियों के 8 नहीं 21 बच्चों की मौत:बालाघाट के 9 गांव-19 पीड़ित परिवारों तक पहुंचा भास्कर, प्रशासन पर मौतें छिपाने का आरोप

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मेरा 4 साल का बेटा कुंवर लाल जुलाई में बहुत बीमार हो गया था। उसके शरीर में माता निकल आई थी और उल्टी-दस्त भी हो रहे थे। हम उसे गांव के झोलाछाप डॉक्टर के पास ले गए। हालत बिगड़ी तो चाचा उसे सालेटेकरी भी लेकर गए, लेकिन वह नहीं बच पाया।

यह कहते हुए मछूलदा गांव की बतिया बाई का गला रुंध जाता है। उनके 4 साल के बेटे कुंवर सिंह (कुंवर लाल) की मौत इसी साल जुलाई में हुई थी, लेकिन सरकारी आंकड़ों में उसकी मौत दर्ज नहीं है।

यह सिर्फ बतिया बाई की कहानी नहीं है। बिरसा ब्लॉक में ऐसे 12 परिवार हैं, जिनके बच्चों की मौत अज्ञात बीमारी से हुई, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका उल्लेख नहीं है। प्रशासन पूरे इलाके में बीमारी से मरने वाले बच्चों की संख्या 8 बता रहा है, जबकि दैनिक भास्कर की पड़ताल में पिछले 4 महीने में 21 बच्चों की मौत सामने आई है।

भास्कर की टीम बिरसा ब्लॉक के 9 गांवों में इन 21 बच्चों के परिवारों तक पहुंची। पड़ताल में सामने आया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इन मौतों की जानकारी थी और वे इसकी सूचना जिला प्रशासन के अधिकारियों को दे चुकी थीं। इसके बावजूद मौतें सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हुईं।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों और जमीनी पड़ताल में एक और विरोधाभास सामने आया। सीएमएचओ का कहना है कि फिलहाल केवल 3 गांव प्रभावित हैं और बाकी गांवों की जानकारी जुटानी होगी।

पड़ताल में यह भी सामने आया कि बच्चों की मौत किसी एक बीमारी से नहीं हुई। अलग-अलग बीमारियों के अलावा कई बच्चों को समय पर जरूरी टीके भी नहीं लगे थे।

भास्कर की टीम सबसे पहले पहुंची बोंदारी गांव, जहां सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं….

ग्रामीण बोले- महीनों से डॉक्टर नहीं आया

बोंदारी गांव के चैन सिंह मरकाम के 5 साल के बेटे सचिन की तबीयत 21-22 जुलाई को बिगड़ी। हालत गंभीर होने पर चैन सिंह उसे बालाघाट अस्पताल ले गए। दो दिन भर्ती रखने के बावजूद सुधार नहीं हुआ, तो वे उसे गोंदिया (महाराष्ट्र) के निजी अस्पताल ले गए। इलाज के लिए उन्होंने 50 हजार रुपए कर्ज लिया, लेकिन 31 जुलाई को सचिन की मौत हो गई।

चैन सिंह कहते हैं, “हमारे गांव में समस्याएं ही समस्याएं हैं। सबसे नजदीकी डॉक्टर 30-40 किलोमीटर दूर है। पीने का पानी तक नहीं है। बारिश में कुआं खराब हो गया, इसलिए अब ‘झरिया’, यानी जमीन से रिसने वाला गंदा पानी पी रहे हैं। गांव तक पहुंचने के लिए रास्ता भी नहीं है। पूरा गांव बीमार है, बच्चे तड़प रहे हैं, लेकिन महीनों से यहां कोई डॉक्टर नहीं आया।”

इलाज के लिए जाते समय रास्ते में ही बच्ची की मौत

गटिया गांव के सहरसिंह की 7 साल की बेटी मंगली को माता (चेचक) निकली थी। उसे खांसी और सर्दी भी थी। सहरसिंह बताते हैं, “मैं बेटी को डॉक्टर के पास लेकर जा रहा था, लेकिन उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। मैं उसे डॉक्टर तक नहीं पहुंचा पाया। मेरे दो बच्चे अब भी बीमार हैं।

उनके चेहरों पर बड़े-बड़े घाव हैं। आंगनबाड़ी और सहायिका आती हैं, लेकिन अब तक कोई डॉक्टर नहीं आया। मुझे डर लग रहा है, उनकी हालत बहुत खराब है।”

वहीं, कोण्डेकसा गांव के चैतू के बेटे अरविंद की मलेरिया के दौरान मौत हो गई। गांव में आई नर्सों ने किट से जांच के बाद उसे मलेरिया बताया था और दवा दी थी। इसके बाद अचानक अरविंद को तेज दौरे पड़ने लगे और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई।

सड़क पर बच्चे का शव दिखा, तब प्रशासन को मिली मौतों की जानकारीग्राम पंचायत अडोरी के सरपंच परशुराम धुर्वे बताते हैं कि 21 जुलाई को उन्होंने किसी काम से बोंदारी गांव के चैतू को बुलाया था। गांव का हाल पूछने पर चैतू ने कहा, “भैया, सब ठीक नहीं है। हर घर में बीमारी है, बच्चे तड़प रहे हैं और दो बच्चों की मौत भी हो चुकी है।”सरपंच ने इसे मलेरिया प्रभावित क्षेत्र में होने वाली सामान्य बीमारी माना। लेकिन अगले दिन पंचायत सचिव ने कोण्डेकसा गांव में कुछ लोगों को एक बच्चे का शव ले जाते देखा। उन्होंने तुरंत सरपंच को इसकी जानकारी दी।इसके बाद सरपंच ने एसडीएम को फोन कर लगातार हो रही बच्चों की मौतों के बारे में बताया। प्रशासन की टीम गांव पहुंची और स्वास्थ्य कैंप शुरू किया। मौतों के आंकड़ों पर सरपंच परशुराम धुर्वे सरकार के आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, “सरकार जो आंकड़ा (8 मौतें) बता रही है, वह पूरी तरह झूठ है।बच्चों की मौत पर सियासत, कांग्रेस ने घोषित की आर्थिक मददबच्चों की मौत के मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो गए हैं। बैहर विधायक संजय उइके ने प्रशासन पर मौतों के आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि मृत बच्चों की संख्या 19 से ज्यादा है।विधायक ने कहा, “इन गांवों में महीनों से बीमारी फैली हुई है। यह विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा बाहुल्य क्षेत्र है। हम लगातार प्रशासन के संपर्क में हैं और मदद कर रहे हैं, लेकिन हमारी मांग है कि इस बीमारी को जल्द से जल्द जड़ से खत्म किया जाए।”कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर संवेदना जताई और कांग्रेस की ओर से प्रत्येक परिवार को 50-50 हजार रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की।

सीएमएचओ बोले- तीन क्षेत्रों में ही मौसमी बीमारी का प्रकोप

भास्कर की टीम ने नौ गांवों का दौरा कर बच्चों की मौतों की पड़ताल की, जबकि स्वास्थ्य विभाग केवल तीन क्षेत्रों को प्रभावित बता रहा है। बालाघाट के सीएमएचओ परेश उपलब के मुताबिक, बीमार बच्चों को अस्पताल लाने में काफी मुश्किल हुई और इसके लिए पुलिस व प्रशासन की मदद लेनी पड़ी।

उनके अनुसार, अस्पताल में अब तक 152 बच्चे भर्ती हुए, जिनमें से 52 अभी भर्ती हैं। आठ बच्चों की मौत हुई है। भास्कर ने जब सीएमएचओ को 8 से ज्यादा मौतों की जानकारी दी तो उन्होंने क्षेत्र के बीएमओ को मौतों के कारणों की जांच करने के निर्देश देने की बात कही।

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