
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी बढ़ेगी और रूस-चीन जैसे गैर-नाटो देशों को वहां सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं होगी।

यह समझौता ग्रीनलैंड के भविष्य में आजाद होने की स्थिति में भी लागू रहेगा। डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि समझौते से डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता बरकरार रहेगी। ग्रीनलैंड अभी डेनमार्क के अधीन एक स्वशासित क्षेत्र है।
ट्रम्प ने जनवरी में कहा था कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा होना जरूरी है और इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है। वे पहले टर्म से ही ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की बात करते रहे हैं।

रूस-चीन नहीं बना सकेंगे सैन्य अड्डा
समझौते की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारें अगले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान इस पर हस्ताक्षर करेंगी। इसे लागू करने के लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों की मंजूरी जरूरी होगी।
ट्रम्प के मुताबिक, समझौते में ग्रीनलैंड में अमेरिका के विरोधी देशों के सैन्य अड्डे बनाने पर रोक होगी। इसके अलावा, ग्रीनलैंड के संवेदनशील इलाकों में कोई बड़ा निवेश अमेरिका की लिखित मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकेगा।
अमेरिकी विदेश विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, नाटो से बाहर के देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा या सैन्य मौजूदगी रखने की अनुमति नहीं होगी।
ग्रीनलैंड नाटो क्षेत्र में आता है। ऐसे में रूस और चीन जैसे गैर-नाटो देशों की सैन्य मौजूदगी रोकने वाला यह प्रावधान अमेरिका के लिए रणनीतिक तौर पर अहम माना जा रहा है।

अमेरिका पुराने ठिकानों को फिर एक्टिव कर सकता है
ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करेगा। उनके मुताबिक, वहां कई ऐसी जगहें हैं जहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी बढ़ाई जा सकती है।
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका के ग्रीनलैंड में एक दर्जन से ज्यादा सैन्य ठिकाने थे। बाद में इनमें से ज्यादातर बंद कर दिए गए।
फिलहाल वहां अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है। हाल के हफ्तों में अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने ग्रीनलैंड का दौरा कर पुराने सैन्य ठिकानों को दोबारा खोलने की संभावनाएं भी देखी हैं।
1951 से ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी
ग्रीनलैंड में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी नई नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने पहली बार यहां सैन्य मौजूदगी बनाई थी।
1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच एक रक्षा समझौता हुआ। इसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने चलाने और अपनी सेना की गतिविधियां करने की काफी आजादी मिली।
इस समझौते में नाटो देशों की सेनाओं को भी ग्रीनलैंड में पहुंच की अनुमति थी। हालांकि, रूस या चीन जैसे देशों की सैन्य मौजूदगी पर साफ रोक नहीं थी।
अब नए समझौते में गैर-नाटो देशों के सैन्य अड्डे और सैन्य मौजूदगी को रोकने की बात कही गई है।

ग्रीनलैंड की आजादी का मुद्दा क्यों अहम है?
ग्रीनलैंड लंबे समय से ज्यादा स्वायत्तता और आजादी की मांग करता रहा है। वहां कई लोग इसे स्वतंत्र देश बनाना चाहते हैं। अभी इसकी रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है।
ट्रम्प प्रशासन की चिंता यह रही है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड स्वतंत्र देश बन जाता है, तो अमेरिका की मौजूदा सैन्य पहुंच पर क्या असर पड़ेगा। नए समझौते में इस स्थिति को भी शामिल किया गया है।
जनवरी में अमेरिका-डेनमार्क के बीच बढ़ा था तनाव
ट्रम्प लंबे समय से ग्रीनलैंड को अमेरिका के साथ जोड़ने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने इस विचार को खारिज किया है।
इस साल जनवरी में दोनों पक्षों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। डेनमार्क की सेना ने अमेरिकी हमले की स्थिति में ग्रीनलैंड के एयरफील्ड को नष्ट करने तक की योजना बनाई थी। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में सैनिक भी भेजे थे।
हालांकि, ऐसी स्थिति कभी नहीं आई।
अब नए समझौते के साथ ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के रिश्तों में एक नया मोड़ आया है। ग्रीनलैंड की संप्रभुता बरकरार रखते हुए अमेरिका वहां अपनी सैन्य पहुंच और दूसरे देशों की मौजूदगी पर नियंत्रण मजबूत करना चाहता है।







